Saturday, 24 September 2022

फलदार दोहे

फलदार दोहे... Q सपने जब से हो गए,घर मेँ चकनाचूर| अरमानो के बेचते, सड़कों मेँ अंगूर || Q केला हमें मिले नहीँ, अमरुद बढ़ते दाम | राहत खोजे आदमी, गली गली बदनाम || Q आकर कब से चल दिया ,मौसम जो था खास | तुम्ही छीलते रह गए, बंजर जंगल घास || Q कहाँ - कहाँ मैं रोपता, सच्चाई का झाड़ | दंभ भरे माहौल मेँ, बुलडोजर है आड़ Q मौका जिसको मिल गया, अकबर हुआ महान वरना खेतों रात दिन, जी भर जुते किसान Q राहत के सब आंकड़े, फेंको कूड़ादान पेड़ो पर अब फल नहीँ, लटके मिलें किसान Q कौन उगाने आ गया , धतुरा और बबूल साथ निभाने की कसम, बैठे सारे भूल Q अपने मन की आड़ मेँ, कर कानूनी बात लेता छप्पर फाड़ के, ई डी की सौगात..., Q कल की अपनी सोच पर, होती हमको खीझ नालायक सब चुन लिए, बातों -बातों रीझ Q जीने का दे हौसला, मौला तू भरपूर ऊँची क़ीमत डायने, रखना हमसे दूर Q ये तो अच्छी सोच है, सब का हो उद्धार आज तुम्हारी बात है, कल अपनी हो बार Q बीते कल को भूल जा, समय रहा विकराल अपनों को खोना पड़ा, भारी बीता साल Q अब करोड़ मे खेलते, भूलो नहीं अतीत हिना रंग तब छोड़ती, घिस -घिस पत्थर जीत Q घर बैठे ही पा सको, तुम जीवन का स्वाद पास कभी फटके नहीं, निराश मन अवसाद Q वे तो अब हैं खेलते,ऊँचे -ऊँचे खेल चिढ़ाते मुँह मशालची, जला जला के तेल Q
पहले जैसा अब कहीं,होता नहीं कमाल फँसा धोखे शेर हो, चूहा कुतरे जाल कभी उतरता ही नहीं, सत्ता गजब बुखार बारह बरस पोंगरी, अजमा ले सरकार सुशील यादव दुर्ग कोई तिलस्म सा लगे, तेरा रूप निखार 👌 मौसम कितना छीन ले,नया नौ लखा हार सुशील यादव दुर्ग

दोहे 25.9.22

भीतर मेरे मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान जहां -जहां अब जा रहा , होते रहता ढेर | मेरी उतरन खाल में, जंगल घूमे शेर सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार अभी-अभी तो लौट हम,देखे रंग हजार पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज लहरें भी करती कहाँ ,कितनी देर लिहाज अपने मकसद डालता,देख परख के घास जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश कल की आहत द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज विश्वास अडिग आपसी ,उत्तम दान-दहेज छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ या भाग राजनीति की मिर्च अब ,लगा रही है आग नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार दीमक बन के खा गई ,दीमागी भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग दूजे की ले ढपलियां,आप सुनाएँ राग संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह -- होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौंक मन माफिक तो चर लिया,बिन बघार बिन छौंक किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक -- फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप -- चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट हैरत दे खैरियत,पूछे कभी न चोट -- रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट -- ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात -- दुनिया समझती है नहीं,नहीं समझते आप मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल अपना सिक्का ढालने,बिठा रही टकसाल हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान खाने को मुहताज थे,अब है छप्पन भोग नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग इतने सीधे लोग भी ,बनते हैं लाचार कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात सरहद रखवाली लगे ,अपने वीर जवान उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल राहत जिसे ,ये वंचित से लोग छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश जिस दिन से बन्दी हुआ,साधू लिपटा भेष इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीन तेरे पन की महक से ,इतरा रही जमीन लक्ष्य निशाने साधिए ,शीतल वचन समीर हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार वे तर्पण याचक नहीं ,सहज बात संस्कार अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान जिनकी संगति में पले , वैतरणी का ज्ञान फुर्सत का तर्पण करें , यही पितर सम्मान लिख के लाये लोग सब ,अपने-अपने लेख तेरी कृपा रुकी हुई , दिल्ली जाकर देख हर कोई क्यो मारता,बात-बात में लात जुटा हुआ है आदमी ,कोल्हू के हालात हर कोई है जनता,मेरे मन की बात केवल तुझे पता नहीं ,कैसे बीती रात कफस-कफस खाली मिले, पंछी हो आजाद हर कोयल की कूक में,रहे न कुछ फरियाद आओ हम मिल बांध दें ,अफवाहों के पैर। दो गज दूर नहीं चले, बिन मकसद के बैर एक करोना व्याधि से ,जग सारा भयभीत शक की नजरें घूमती ,कण-कण में मनमीत एक करोना से मचा,दुनिया मे कुहराम मुझको अल्ला से शिफा, तुझे बचाए राम जाने कैसा मच गया ,धकधक हाहाकर तूफानों के बीच में ,किसका बेड़ा पार देखे अपनों के यहाँ , बदले- बदले रंग बेबस मन को तौलते ,दुविधा के पासंग .. लोगों की पहचान में , हो जाती है देर खुशकिस्मत अंधे यहां ,जिनके हाथ बटेर .. मैं हूँ अपने आप से , इधर बहुत नाराज सूरज सुख का ढल गया , नींद खुली लो आज .. सुधियों के आंगन कभी ,रहती थी मुस्कान हुआ यहींS मन लापता ,खोकर खुद पहचान .. शायद मेरे मर्म तक ,पहुँच न पाते आप. मेरे कद का इस लिए , लेते रहते नाप.. इस बहाव में क्या करें ,जल के भीतर मीन. जाना था जापान तो ,पहुच रही है चीन.. संभव सा दिखता नहीं , रुके कहीं बहाव. लौट चले लेकर हमी,अपनी टूटी नाव.. जब भी छूती ये नदी , खतरा क्रूर निशान. बह जाता है साथ में,हाथो का सामान.. सावन का अंधा हुआ . हरे -हरे की सोच. हरी-हरी के जाप में , भूलो कण्टक मोच.. सावन का अंधा हुआ ,सोच हरा चहुँ ओर. बिगड़ी शायद यूँ बने ,जोर लगा कुछ और.. केवल इतना ध्यान रख , होय नहीं अभिमान. तीर वहीं हो लक्ष्य में , मछली आँख निशान.. हरि अर्जुन को दे गए ,गीता में सन्देश. रण में जो है सामने ,न बन्धु- सखा नरेश.. दुविधा के हर मोड़ पर ,देता था जो ज्ञान. कृष्ण बना था सारथी , तज कर तेज महान.. लीला जिसकी देख के ,चकित विश्व सब ओर. ऊँगली में पर्वत उठा , रोका बारिश जोर.. राजनीति में जो निपुण, किया अधर्म विरोध. हम ऐसे प्रभु कृष्ण पर , करे सार्थक शोध.. बिगड़ी बात बनी नहीं , सावन बीता जाय. मेरे संकट काल को , कौन दिशा बतलाय.. जरासंघ अपराध हो , या रिश्तों में कंश. गर्व मीन को ले उड़े , काल- समय का हंस.. दिखता मुझको सामने , हर कोई नाराज. जिसका बिगड़ा कल रहा ,कैसे सुधरे आज.. राम नाम की नाव थी ,खेने बाला ख़ास. रामायण पहुचा गया , घर-घर तुलसीदास.. असमंजस मन्दोदरी,समझाती थी नेक सन्धि -सुलह हो नाथ अब , दृढ़ता से जिद फ़ेंक वानर -दल की वीरता ,आई हरदम काम लंका जलती रह गई ,छूटी पकड़ लगाम रंग अबीर गुलाल का ,सीखो शिष्टाचार केवल उस पर डालना,जिस पर हो अधिकार इस होली में तंज का ,करना नही प्रयोग अपने -अपने हाल में,भड़के बैठे लोग पल भर में ही ढह गये ,महलें आलीशान नफरत की थी होलिका,आतंकी तूफान उस घर मे भी झांक लो,जहां नहीं कुछ शेष मरहम पट्टी प्यार दो ,छोड़ो नफरत द्वेष जाने कैसे कर गया ,मुझ पर कौन प्रयोग कॅरोना ग्रसित मैं हुई ,प्रेम व्यथित संयोग बदला बदला सा लगे , मायावी व्यवहार समतल नित मैदान में,व्यापक मचा प्रहार दरवाजे सब बन्द हैं , ईश सभी नाराज तू भी रख तैयारियां , गिरने को है गाज जब तक आकर जायगा, एक बड़ा तूफान हिल जाएगी नीव ही , जहां खड़ा इंसान व्यापक अर्थ नसीब का , जान सका ना कोय पछतावा आँसू बिना, कर्म अकारथ होय खेल खेल में डूबना, कैसे होता यार लोग चार फांसी चढ़े, जाने ये संसार मन की सारी धारणा,हो जाती निर्मूल जड़ें करोना बेधती,बन संकट के शूल कोई भी ज्ञाता नहीं ,क्या उपाय अनुकूल अंध भक्ति विश्वास ही,दें प्रभाव प्रतिकूल बचना बारिश से तुझे ,अपनी छतरी तान इस क्रोना बौछार में , केवल दूजे की मान उड़ती पतंग खूब ये , देते जाना ढील समझौतों की डोर कम, नभ में उड़ती चील एक अकेला हो गया , भीड़ बीच इंसान खींचे प्रभु ने हाथ अब ,निद्रा-मग्न भगवान तेरा इलाज जानता , कितना वैद्य- हकीम बस इतनी है खैरियत , मुश्किल के दिन तीन सर पर इतना बोझ तो ,अक्सर सहता पेट पर बचपन को काम में,चढ़ा रहे क्यो भेट मन्दिर अब सूना हुआ ,मधुशाला में भीड़। कोलाहल के बीच में, कोयल की है नीड़ मदिरालय में शोर है,मन्दिर है सुनसान ये कलयुग की आस्था , युग का है अवसान कठिन काम मेहनत से,करें श्रमिक सब लोग। उस श्रम का हम आम जन, जान सकें उपयोग श्रम की जननी पेट है ,इसका रखना ख्याल करो कारखाने से तभी,पैदा इच्छित माल रब से मांगू ये दुआ ,बस्ती हो खुशहाल। सबकी लम्बी हो उमर ,जी लें सालों साल जाने कितने शह मिले, कितनी खाई मात बता गया कोविड हमे , पल भर मे औकात कौन छीन कर ले गया, तेरा सब्र करार... तारे दिन मे देखती,अजब हुआ संसार.. दुनिया पीछे है पड़ी,धोकर अपने हाथ अब क्या और बिगाड़ती,आती वापस नाथ। अपने-अपनो ने लिया ,मिल-जुल सब कुछ बाँट एक करोना बच गया ,बन के टाई नॉट पँछी नहीं है डाल में,पथिक नहीं है राह रहबर भूखे मर रहे, राहजनी की चाह राहजनी की चाह, लोग जाने-पहचाने किसे भगाएं मार,घरों के सभी सयाने जन-जन लापरवाह हैं, दौड़ पड़ेगी भीड़। सोच-समझ के खोलना,नाजुक डाली नीड़ आज करोना त्राण से, करता हूं आगाह। भूले से मत खोलना, बोतल जिन्न गुनाह चला न जाये जब तलक ,दरवाजे से दूर तुम भी कहां बजा सको,अमन-चैन सन्तूर छोड़े हैं घर- बार हम ,छूटा सारा गांव। जाने अब किस हाल में,मिले वापसी नाव भविष्य तो अँधकारमय,क्या ठीक वर्तमान। भूसे में तिनका गुमा,दोष किसे यजमान बना दिया दिन आलसी,रातें हैं नाकाम किसको रख लें काम पर,किससे मांगे काम दुविधा में बेसुध हुए ,नहीं योग व्यायाम अंग लगे खाना कहाँ,निष्फल चारो धाम अपने मन की अब कहो, डूबा खड़ा जहाज पी लें कुंआ खोद के,अब वो नहीं रिवाज पँछी नहीं है डाल में,पथिक नहीं है राह फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल एमए- बिए का करौं,ओमे हे पिचकाट अतका जबर हवे नहीं ,दद्दू हमर ललाट करोड़ बारह सौ फूंके हैं ,बांटे मोबाइल सरकार गंवार-अपढ़ जनता होवे,मोबाइल की क्या दरकार जिन गावो में भूखा प्यासा,खेती करता दिखे किसान मोबाइल उन हाथो देकर,तुम समझो खुद धन्य महान नक्सलवादी वहीँ जमे हैं ,ले पैसा इस नाम अकूत रोजाना ताबूत भेजे जाते ,भारत वीर जवान सपूत किस मिटटी के तुम हो माधो ,ह्रदय तुम्हारा हाय कठोर विपदा- संकट रखते साथी ,नेता- अफसर चिन्दी चोर कौन योजना के बलबूते ,होगी अब की नैय्या पार जनता और भरम में डालो ,कर लो फिर से छल व्यापार विकास मुद्दे चुनाव गायब , कहो राज के तारणहार मोबाइल दे के लूट रहे , सरकारी संचित भंडार पढ़ने वाले बच्चो को देकर ,करते यहां गहन अपराध भटकाने-दौड़ाने पथ में ,छोड़ दिए हो क्रोधित बाघ जनमत को अब मत भटकाओ,देना होगा सभी हिसाब बन्द करो ये दारू खाने, मुफ्त बांट चुनावी शराब बारिश में अब भीगना ,होता है हर रोज डूबी अपनी नाव कब ,किधर करें हम खोज अपने-अपने दंभ को ,भूल-बिसर के आज शामिल होली में रहो ,जुड़ता दिखे समाज फागुन-फागुन सा हुआ ,सावन बिछुड़ा मीत छोड़ अधर की बासुरी ,राधा विरहा गीत कायरता की राह में ,हद से निकले पार माया जननी मोह की,देख यही संसार पद प्रतिष्ठा वो छोड़ के ,सड़कें नापे रोज कीचड़-कीचड़ में खिले ,पंकज,कमल,सरोज देख तुम्हारी सादगी , हाथो बचा गुलाल जीवन सारा काट दे ,इतनी सोच मलाल संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास कल थे वे जो रूबरू ,जन सेवक बन बीच आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच रेखा कभी- कहाँ खिंची,परंपरा के खेल देखो जला मशालची,जितनी-जी भर तेल अवगुन पीछे छोड़ कर ,गुन की करे बखान राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर

Friday, 16 September 2022

 1

बेटे से पद छीनता,कितना बाप कठोर  I यौवन ययाति सा मिले,बात यही पुरजोर II


 



2

पिता पुत्र से बोलता ,देखो वीर सपूत  I सायकल तुझे सौप दूँ ,और निकाल सबूत II





3

सब की है ढपली यहाँ ,सबके अपने राग  I ढोल-नगाड़े     पीटना ,सुर जाए जब जाग II






महसूस नहीं हो हमे ,कतरो ऐसे पंख  I महा-समर आरंभ हो ,बज जाए फिर शंख II


 



4

फिर चुनाव आना हुआ,निकले वन से राम  I हर बगल है छुरी दबी,रखो काम से काम II


 



5

मानवता की आड़ में,दानव रहा दहाड़  I आशंकाओं का कहीं, गिरे न मित्र पहाड़ II





6

आज आदरणीय परम,रूठ गए हैं आप  I              लायक अपने पूत से ,रूठा करता बाप II


 



7

आहत मन से देखते ,कुछ अनबन कुछ मेल  I सायकल की अब मान घटी ,पटरी उतरी रेल II


 



8

बेटा करता बाप से ,विनती और गुहार  I           दिलवा दो अब सायकिल ,पंचर दियो सुधार II


 



9

लिखने वाले लिख रहे ,तरह तरह आलेख  I सबके अपने मन-गणित,अलग-अलग उल्लेख II


 



10

विकसित होते राज में,है विकास की गूंज  I     एक दूजे टांग पकड़,तंदूर वहीं भूंज II


 



11

कॉलर नही कमीज में,पेंट नही है जेब  I                नँगा होने तक रचो,कोई नया फरेब II


 



12

उम्मीदों के दौर में ,तुम भी पालो ख़्वाब  I कैशलेस हो खोपड़ी,'बाबा छाप'खिजाब II


 



13

पंछी बैठे छाँव में,उतरा दिखे गुरूर  I आसमान ऊंचाइयां,कतरे पँखो दूर II


 



14

साल नया है आ रहा,हो न विषम विकराल  I संयम उर्वर खेत में, बीज-व्यथा मत डाल II


 



15

घटते-घटते घट गया ,पानी भरा तलाब  I तनिक ओस की चाह में ,चाटो अपने ख्वाब II


 



16

माया कलयुग में जहां ,दिखे नोट की छाप  I सार दौलत बटोर के ,हुए वियोगी आप II


 



17

इस सूरत का आदमी,पायें कभी-कभार  I     बिना-गिने ही नोट को,सौपे गंगा धार II


 



18

दंगल दिखा कमा गए ,भारी भरकम नोट  I प्रभु हमारे दिमाग वो ,फिट कर दो लँगोट II


 



19

नोट-काले जेब रखे ,उजली बहुत कमीज  I    तू भी राजा सीख ले ,धनवान की तमीज II


 



20

कितनी है संभावना ,फैला देखो पाँव  I        सीमित होती आय की,चादर जिधर बिछाव II


 



21

अंग-अंग सारा टूटता,छलनी हुआ शरीर  I कब छोड़ोगे बोलना ,अपना है कश्मीर ... II


 



22

तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूत  I आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत... II


 



23

देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर  I ऊपर ने बुन क्या दिया,उलझी सी तकदीर II


 



24

लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर  I खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर II


 



25

मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर  I       चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर II


 



26

जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान  I चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण II


 



27

तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम  I      मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम II


 



28

मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर  I चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर II


 



29

आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर I         तब-तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर II


 



30

तिनका-तिनका तोड़ के ,रख देता है आज  I है कहीं अकड की बस्ती ,फिजूल कहीं समाज II


 



31

परिभाषा देशहित की ,पूछा करता कौन  I बहुत खरा एक बोलता ,दूजा रहता मौन II


 



32

भव-सागर की सोचते ,करने अब की पार  I गए निकल चुकाने तभी ,गिन-गिन कर्ज-उधार II


 



33

गया उधर एक मालया ,हथिया के सब माल  I किये हिफाजत लोग वे ,नेता, चोर, चंडाल II


 



34

 कभी देश की देख गति ,है कितनी विकराल  I यथा शीघ्र अब जीम के ,खाली कर पंडाल II


 



35

मुह क्यों अब है फाड़ता ,कमर तोड़ है दाम  I किसको कहते आदमी ,चुसा हुआ है आम II


 



36

 मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर  I चरण धूलि माथे  लगा ,चन्दन , ज्ञान-अबीर II


 



37

 जिससे भी जैसे बने, ले झोली भर ज्ञान  I आलोकित जग जो करे ,मगज रखा सामान II


 



38

 एक  जुलाहा हुआ चकित ,देख सूत कपास I   तन से ताना क्या बुने,मन बाना विश्वास II


 



39

 हम जिसको समझा किये ,अपने बहुत करीबI वो ही आखिर बन गया , आड़े प्यार रकीब II


 



40

 मन भंवरा मंडरा रहा , तुझे समझ के फूल  I यही अक्ल की खामियां ,बचपन मानो भूल II


 



41

 मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम में बौर  I बिन तुझसे मिल-भेंट के ,हलक न उतरे कौर II


 



42

तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूतI आत्मचिंतन  सुई  पकड़,ज्ञानी डाले सूत II


 



43

 देख जुलाहा हाथ की ,  तिरछी-खड़ी लकीर  I ऊपर से बुन क्या दिया,विरासत कि तकदीर II


 



44

लोह ताप से  भूलता ,अपनी खुद तासीर  I खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर II


 



45

  नफरत के इस कुम्भ में,खोज प्रेम लेवाल  I  जिसके भीतर 'मै' घुसा,उतरे तो वह खाल II


 



46

जड़ गया वो माथे में ,मुझसे जुडा सवाल  I  ले हाथो में उस्तरा , बजा गया जो गाल II


 



47

गली-गली में जीत का, सिक्का तभी उछाल  I अगर खजांची बाप हो ,घर में हो टकसाल II


 



48

माथे को क्यों पीटना ,होता किसे  मलाल  I देने वाला देखता ,है छप्पर  किस  हाल II


 



49

दिन-रात कौन पूछता ,एक सरीखा सवाल  I ले हाथो में उस्तरा , बजा रहे क्यूँ गाल II


 



50

लिखिए कुछ ऐसा मनुज,सज उठे वर्तमान  I हो टक्कर की  लेखनी ,रख  आत्मसम्मान II


 



51

कोलाहल हो 'जग' अगर,बनो  शान्ति के दूत  I ले चरखा फिर हाथ में ,सुख के कातो सूत II


 



52

वाणी में अमृत घुले, रहे  मधुर आवाज  I परिपाटी हो स्थापना , जिसको कहें रिवाज II


 



53

तुमसे क्या-क्या मांगता ,व्याकुल आज समाजI स्वर्ण नोक बना कलम ,पहना दो फिर ताज II


 



54

स्वारथ सभी  छोड़ दो ,त्याग दो अहंकार  I परमार्थ में जी लगा ,जानो तुम संसार II


 



55

बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय  I आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय II


 



56

खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून  I फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी  भून II


 



57

जाने कब से ढूढता ,भूली गुमी किताब  I शायद मिल जाए दबा,सूखा हुआ गुलाब II


 



58

डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल  I मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल II


 



59

लापता कहीं हो गई , पुत्र-मोह ललटेन  I मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन II


 



60

ओढ़ पहन के बैठना, नैतिकता की खाल  I जनता केवल है खड़ी,चौरहे बेहाल II


 



61

फूटे करम बिहार के,साथ नहीं कंदील  I         जो अन्धेरा देखती ,पैरों कांटे  कील II


 



62

संकट में हो निकटता,रखना दुःख क्षण नेह  I ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक  देह II


 



63

कितना लगता है बुरा ,गिनती के दिन चारI इभन-आड के फेर में ,ताक रहे इतवार II


 



64

डोर न ढीला छोड़ना ,प्रीत पतंग उडाय I    बिन मागे कुछ तो मिले,मांग के कछु न पाय II


 



65

 उलझे मन की बात ये ,कभी न सुलझी डोर  I रात करवटें ले कटी ,झपकी आती भोर II


 



66

 जनता की दरबार है ,जनादेश सब होय  I राज-रंक पल में करे ,आप न समझे कोय II


 



67

 मोदी तेरे राज में ,दीन -दुखी हैं लोग  I अच्छे दिन बुखार चढ़य,बुरे दिनो के रोग II


 



68

व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष  I हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश II


 



69

जिस दिन से बन्दी  हुआ,साधू लिपटा भेष  I इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष II


 



70

पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद  I बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद II


 



71

जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार  I     जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार II


 



72

सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास ।  I बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश ।।  


 



73

मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल  I अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल II


 



74

राहत जिसे मिला नहीं ,ये वंचित से लोग ।  I छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग ।। 


 



75

मन के भीतर मच गया ,सुबह-सुबह कुहराम I तन के खातिर नाम को ,माया मिली न राम ।। 


 



76

एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर I   असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर ।।   


 



77



 



78

हाथ लगी जब चाबियां ,निकले  नीयत खोर  I बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर   II


 



79

अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान  I मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान   II


 



80

सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन  I जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन   II


 



81

मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक  I         कौन बताए कब हुआ ,असली राजा रंक  II


 



82

सौदागर ये वहम के ,जीना किया हराम  I छुरी लेकर घूमते ,बगल रखे हैं राम  II


 



83

उम्मीद लगा बैठते ,गुठली के हों दाम  I      सीख गए वे  बेचना ,बात-बात में राम   II


 



84

आते-जाते रह गए ,हम सब उनके द्वार  I जिसका तय था हो गया ,जी भर के उद्धार  II


 



85

मौन रहा करता सदा,साधना सतत लीन.  I जाने कहाँ खिसक रही,पैरों तले जमीन।।   II


 



86

रहते हैं  सोए सभी,जनमत हरदम लोग  I कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग  II


 



87

दोहा सादा मंच पर ,दंगल हो शालीन  I किसकी चेतना बैठती ,सने पांव कालीन  II


 



88

दोहा देखो मंच पर ,दंगल में तब्दील ।  I कोई भगत भभूत से ,धूमिल है कंदील ।।  II


 



89

धीरे-धीरे ही छूटता,गुरु देव का साथ  I         कानो अब भी गूंजता,खोलो बेटा हाथ II


 



90

एक अजूबा है यही ,दूजे का क्या काम  I   माया जिसको मिल गई,सूझे उसे कब राम  II


 



91

जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज  I वैभव सारा रह गया ,पड़ी काल की गाज  II


 



92

मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम  I     मन थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम II


 



93

इस जीवन  में आपको,मिले खुशी भंडार  I पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार II


 



94

कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार  I पहचान करे आप की ,मानव पर  उपकार II


 



95

मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश  I नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश II


 



96

उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश  I निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती  खामोश II


 



97

जिंदगी कौन तुझसे, मसखरी कर सका  I     लड के कहाँ उम्र,अपनी बड़ी कर सका II


 



98

खुद वजूद से भटकते रहता है आदमी  I     आप-स्वयं से कब, यायावरी कर सका II


 



99

तिलस्म दिखे हैं होते कई, यहाँ साहेबान  I बिगड़े रिश्तो में कौन, जादूगरी कर सका II


 



100

निपटना तो अभाव से ,आएगा ही कभी  I क्या मजाल कोई उड़न- तश्तरी कर सका II


 



101

एक बार पहना ,इस्त्री किया कोट वो  I       जस का तस कब दुबारा उसे घड़ी कर सका II


 



102

जिस अदालत हैं बेजान से हलफनामे वहां  I तेरा मुंनशिफ तुझे कितना बरी कर सका II


 



103

खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन।  I हर करतूत मियाद पर,पाती सजा यकीन ।। II


 



104

जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार।  I          बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।। II


 



105

आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल।  I भगवा-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।। II


 



106



 

एक अधम से काम ने,औरो की ली जान।  I कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।। II


107



 



108

मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत  I राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत II


 



109



 



110

गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार  I         कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार II


 



111

प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन  I मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन II


 



112

बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन  I      पानी पानी ढूढते,नीचे पैर  जमीन II


 



113

मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम  I    सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम II


 



114

मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग  I जलते जलते बच गया ,आहत  अमन सुहाग II


 



115

विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम  I प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम -- II


 



116

एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार  I       बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार II


 



117

वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर  I भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर II


 



118

लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ  I      पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ II


 



119

आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीनI तेरे पन से तू मिटा ,बदला वहम- यकीन II


 



120

लक्ष्य निशाने  साधिए ,शीतल वचन समीर  I हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर II


 



121

सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर  I तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर II


 



122

आशा का दीपक जला,तम में हुआ अधीर  I शांत रहो उजला दिखे,हिंदी की तस्वीर II


 



123

हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन ।  I मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।। II


 



124

पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार I कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार  II


 



125

जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास I  फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस II


 



126

मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल  I                कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल II


 



127

बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल  I            साफ  सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल II


 

 


128

 कर ले कुछ तो नेकियाँ ,कहीं  कुए में डाल  ।  शायद  दुर्दिन में  यही , तेरा रखे खयाल   ।।


 

  


129

दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल  ।         डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल  ।।


 

  


130

निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम  ।     इस माया संसार का,किसके पास लगाम  ।।


 



131

 


 

रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग  ।       कौन मिटाने आ सका, पाँच साल का रोग  ।।


132

  


 

नींद भरी थी आँख में,खुला रहा  लंगोट  ।     कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट  ।।


133



 

फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील  ।        किसको सूझे  देखना ,पैरों कांटे  कील  ।।


134



 

थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत  ।     सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत  ।।


135



 

अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल  ।  रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल  ।।


136



 

जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट  ।     उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट  ।।


137



 

ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को  सौगात  ।      निकले  कैसे  बाढ़ में ,थमने दो बरसात  ।।


138



 

आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान  ।  फिर से लंका जीत ले ,थका हुआ हनुमान  ।।


139



 

खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले  जमीन  ।  कल जो तू सरताज था,खारिज आज यकीन  ।।


140



 

जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम  ।      जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम  ।।


141



 

भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग  ।      भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग  ।।


142



 

इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार  ।       नेताओ  के रूप में   ,निभा रहे किरदार  ।।


143



 

मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान   ।     उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान   ।।


144



 

सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान   ।  लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान   ।।


145



 

पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम   ।  आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम   ।।


146



 

ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान   ।  तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर  बदजुबान   ।।


147



 

सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान  ।     मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान  ।।


148



 

बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल  ।     वादा  टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल  ।।


149



 

सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार   ।  चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार   ।।


150



 

पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार   ।  देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार   ।।


151



 

वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार  ।  अभी-अभी तो लौट हम,देखे  रंग हजार   ।।


152



 

मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार     दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार   ।।


153



 

संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान  ।  भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान  ।।


154



 

जनता बहती धार में ,बिखरा  टूट जहाज  ।      जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास ।।


155



 

किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश  ।     कल की आहत द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश  ।।


156



 

बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज ।  विश्वास अडिग आपसी ,उत्तम दान-दहेज  ।।


157



 

छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज  ।      भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज  ।।


158



 

भाई  तेरा प्यार ही,जीवन भर उपहार  ।     आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार  ।।


159



 

दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अबभीगोल। दीमक बन के खा  गई ,दीमागी भूगोल  ।।


160

 


 

लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास  । महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश  ।।


161



 

दूजे की ले ढपलियां,आप सुनाएँ राग  ।      संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग  ।।


162



 

ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह  । संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह  ।।


163



 

देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून  ।     काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून  ।।


164



 

कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे  रंक  ।    किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक  ।।


165



 

टाँग आपसी  खींचना, बन पंचायत खाप  ।    फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप  ।।


166



 

कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और  ।    रहने दो   हर बात को ,निजी आपसी तौर  ।।


167



 

कैसे  मूक बधिर रहे  ,बैठे थे खामोश  ।     सत्तर बीते साल तब ,आया हमको होश  ।।


168



 

कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम  ।    जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम  ।।


169



 

जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर  । खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर  ।।


170



 

राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द  ।     अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द  ।।


171



 

लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिमकाल। किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल  ।।


172



 

धुंआ- धुआ होता रहे ,मन उपजा संदेह  ।     बन मे सूखी लकडियाँ ,घर मे सुलगे देह  ।।


173



 

ताने से तन ढांक ले ,बाने से मन भूत  ।      मौन जुलाहा कह गया ,ले धागा औ सूत  ।।


174



 

पीढी को जो तार दे ,अकेला हो सपूत  ।     साई कभी करो जतन ,दे दो राख भभूत  ।।


175



 

यश -अपयश सब साथ है ,भले-बुरे के संग  । लकड़ी मे जस घुन लगे ,लोहे मे  तस जंग  ।।


176



 

राम -रहीम दुआर मे ,कौन गरीब -अमीर  ।     तू भी बन के देख ले ,पंडित ,पीर फकीर  ।।


177



 

जिसके भीतर 'मै' घुसा ,उतरे तो वह खाल  । नफरत के इस कुम्भ मे ,खोज प्रेम लेवाल  ।।


178



 

ले हाथो मे उस्तरा ,बजा गया वो गाल  ।      मेरे माथे जड गया ,मुझसे जुडा सवाल  ।।


179



 

उपर वाला देख रहा,छप्पर है किस हाल  ।     मत माथा अब पीट तू,कर मत तनिक मलाल  ।।


180



 

तन से क्या ताना बुने ,मन बाना विश्वास  ।    एक जुलाहा है चकित ,देखे सूत-कपास  ।।


181



 

आखिर मे बन वो गया ,आडे प्यार रकीब  । जिसको हम समझा किये ,मन के बहुत करीब  ।।


182



 

यही अक्ल  की खामियां ,बचपन मानो भूल  । मन भौरा मंडरा रहा ,तुझे समझ के फूल  ।।


183



 

बिन तुझसे मिल भेंट के ,हलक न उतरे कौर  । मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम मे बौर  ।।


184



 

नेता झाड़ें दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार  ।     किस मिटटी के हो बने ,माधो  मेरे यार  ।।


185



 

शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात  ।    छोटे-छोटे  दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात  ।।


186



 

नेता  आकर जीम लो,कंबल वाली घूस  ।    अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस  ।।


187



 

बातो की बस  छूरियां,संकट रहता राम  । महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न  काम  ।।


188



 

मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल  ।    डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल  ।।


189



 

एक निशानी प्यार की ,रखो  जरा सम्हाल  ।    कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल  ।।


190



 

चल  विकास की बात कर, तुझको रोके कौन  । नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन  ।।


191



 

तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद  ।      नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद  ।।


192



 

कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल  ।     संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल  ।।


193



 

माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक  ।  राजा कभी न बन सका ,मन से रहता  रंक  ।।


194



 

मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग  ।  तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग  ।।


195



 

दुनिया  समझती है नहीं,नहीं समझते आप  ।  मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप  ।।


196



 

संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान  ।      शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान  ।।


197



 

सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल  ।      शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल  ।।


198



 

करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार  ।  साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार  ।।


199



 

भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल  ।      अपना सिक्का ढालने,बिठा रही  टकसाल  ।।


200



 

उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान  ।     दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान  ।।


201



 

खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज  ।  ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज  ।।


202



 

खाने को  मुहताज थे,अब है छप्पन भोग  ।    नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग  ।।


203



 

इतने सीधे लोग भी  ,बनते हैं लाचार  ।     कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार  ।।


204



 

दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात  ।  लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात  ।।


205



 

सरहद  रखवाली लगे ,अपने वीर जवान  ।  उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान  ।।


206



 

जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार  ।         बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार  ।।


207



 

सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास   ।     बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश   ।।


208



 

मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल  ।  अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल  ।।


209



 

मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम   ।  तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम   ।।


210



 

एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर   ।  असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर   ।।


211



 

व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष  ।     जिस दिन से बन्दी  हुआ,साधू लिपटा भेष  ।।


212



 

इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष  ।  आखिर में बन्दी हुआ ,साधू लिपटा भेष  ।।


213



 

अत्याचारी ज्ञात हो ,अवगुण रहे न शेष  ।     पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद  ।।


214



 

बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद  ।     जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार  ।।


215



 



216



 

सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर  ।  तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर  ।।


217



 

पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार   ।  कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार   ।।


218

अवसर तुमको है मिला ,पितर  करो सम्मान   ।  दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान   ।।


 



219

जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास   ।  फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस  ।।


 



220

मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल  ।              कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल  ।।


 



221

बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल  ।         साफ  सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल  ।।


 



222

जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग  ।        करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग  ।।


 



223

प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन  ।       मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन  ।।


 



224

मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम  ।      सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम  ।।


 



225

कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार  ।         जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार  ।।


 



226

फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार  ।      बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार  ।।


 



227

मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत  ।  राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत  ।।


 



228

जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज  ।     वैभव सारा रह गया ,गिरी  काल की गाज  ।।


 



229

एक अधम से काम ने,औरो की ली जान  ।  कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान  ।।


 



230

सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम  ।     छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम  ।।


231



 

नुकसान-नफा देख मत,बाबाओं के संग  ।      ज्ञान गया है भाड़ में,नोट कमाय दबंग  ।।


232



 

मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज  ।  दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज  ।।


233



234

सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन  ।  जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन  ।।


 



235

अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील  ।  व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील  ।।


 



236

मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक  ।      राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक  ।।


237



 

कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून.  ।      लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून  ।।


238



 

फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब  ।  लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब  ।।


239



240

जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और  ।  मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर  ।।


 



241

तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार  ।  काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन  दुश्वार  ।।


 



242



243



 

नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध  ।  अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध  ।।


244



 

मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग  ।  जलते जलते बच गया ,आहत  अमन सुहाग  ।।


245



246

विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम  ।  प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम --  ।।


 



247

एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार  ।      बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार  ।।


 



248

वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर  ।      भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर  ।।


249



 

लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ  ।      पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ  ।।


250



 

किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर  ।  कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और  ।।


251



252

पास हमारे  वोट हैं,करते तुम तकरार  ।     मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार  ।।


252



253

रावण करता  कल्पना, सोना भरे सुगन्ध  ।    पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध  ।।


254



254

सीढि स्वर्ग पहुचा सके  ,किया रावण विचार  ।  आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार  ।।


255



255

मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास  ।  कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास  ।।


256



257

कौन -कौन आ  बैठते,माया रूप जहाज  ।  ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज  ।।


257



258

बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच  ।      जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच  ।।


258



259

गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल  ।  जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल  ।।


260



260

आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल  ।  अगर कसैला स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल  ।।


261



261

सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग  ।      कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग  ।।


262



263

संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात  ।     जब ये आवें साथ में ,जगत  हुआ  बौरात  ।।


263



264

इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम  ।  भीतर फिर से झांक लो ,कितना साबुत  राम  ।।


264



265

इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक  ।     किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक  ।।


265



266

भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन  ।       मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन  ।।


267



267

संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह ।     ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह  ।।


268



268

   सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार  ।     साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार  ।।


269



270

इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास  ।  आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास  ।।


270



271

अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत  ।     यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत  ।।


271



272

कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप  ।  फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप  ।।


273



273

भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग  ।  सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग  ।।


274



274

अपने बस में अब नहीं ,बस में करना आज  ।  बिखरा है कुनबा सभी ,टूटा हुआ समाज  ।।


275



276

नोटबन्दी हुई वजह , हाथ  जरा है तंग  ।      वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग  ।।


276



277

ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप  ।  फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप  ।।


277



278

मन की जैसी धारणा ,वैसा रख  उत्साह  ।     एक जलन की आग से,घर-घर हुआ तबाह  ।।


279



279

बूढ़े बरगद ने पढा ,पोथी- ज्ञान किताब  ।     उल-जलूल तू ने लिखा ,पाता रहा खिताब  ।।


280



280

एक उधर संयोग था,एक यहां  संयोग  ।      हठधर्मी हथिया लिया ,राजपाठ बिन योग  ।।


281



282

दोहे तुम भी सीखना ,नौसिखिये हो यार  ।  हलन्त कामा,भूल की ,करना बाद विचार  ।।


282



283

सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख  ।        शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख  ।।


283



284

हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल  ।     कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल  ।।


285



285

कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग  ।  हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग  ।।


286



286

हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय  ।  झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय  ।।


287



288

हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन   ।  मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन   ।।


288



289

गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार  ।         कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार  ।।


289



290

गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार  ।  कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार  ।।


291



291

बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार  ।  सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार  ।।


292



292

बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर  ।  हाथ लगी जब चाबियां ,निकले  नीयत खोर  ।।


293



294

हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार  ।  जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार  ।।


294



295

रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब  ।  हलके  हमको ले रहे,होंगे भारी चीज  ।।


295



296

समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज  ।  हलके  हमको ले रहे,होंगे भारी चीज  ।।


297



297

नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर  ।  सोते से अब जागिये ,होने को है देर  ।।


298



298

पाखंडी-पापी  चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग  ।  हैरान यही  देखकर ,बदल न पाए लोग  ।।


299



300

मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम  ।  हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम  ।।


300



301

सौ बार लुटे गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव  ।  अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव  ।।


301



302

किसी  ड्राइंग रूम का ,बिगड़े ना कालीन  ।  हममे ये संस्कार हो  ,होली हो शालीन  ।।


303



303

हर दुविधा  के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत  ।  लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत  ।।


304



304

मन थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम  ।  मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम  ।।


305



306

पहचान करे आप की ,मानव पर  उपकार  ।  कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार  ।।


306



307

नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश  ।  मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश  ।।


307



308

निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती  खामोश  ।  उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश  ।।


309



309

पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान  ।  रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान  ।।


310



310

ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला  ।  गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला  ।।


311



311

गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता  ।  इसीलिए केवल यही ,इशारों में  कहता  ।।


312



313

पाखंड-पाप चांटते ,छप्पन- छप्पन भोग  ।  हैरान यही  देखकर ,बदल न पाए लोग  ।।


313



314

बाहर कहीं बहार है,चार तरफ तितलियाँ  ।  छप्पन-छप्पन भोग,रहे घी में उंगलियां  ।।


314



315

खेलो खाओ लूट लो,लोग हैरान नहीं  ।  हांफ रहे क्यों आज भी,देख मैदान वही  ।।


316



316

जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल  ।  गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल  ।।


317



317

है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे  ।  पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे  ।।


318



319

आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार  ।  सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार  ।।


319


 जाते हुए सिखा गए,ये गोरे अंग्रेज।

रखवाली सरहद करो, रख तलवारें तेज ।।

*

हिम्मत कभी न हारिए,  साहस भी मत छोड़ ।

एक करोना बात क्या, जग में रोग करोड़ ।।

*

हाथो हजार कर गया,उल्टे सीधे काम ।

मुंह ढाप  सोया अभी,दर्शन दुर्लभ राम ।।

*

किसे शिकायत हो भला ,कोई क्यूं नाराज। 

माया नगरी खेल में,सब के सर में ताज ।।

*

बारिश की संभावना, बाढ़ नदी संकेत।

तू किसान बैठा यहां,कौन देखता खेत।।

*

दांवपेंच कानून के , फसलों को आघात।

घिसता किसान जूतियां ,पागल के अनुपात ।।

*

हाथ वक्त मारा हुआ ,ये बचा बदनसीब।

वंचित है लाचार है ,गिनती बढ़ा गरीब ।।

*

सुशील यादव 

 सरसी छंद में परिवर्तित दोहे 2

*

हमको सिखा गए हैं जाते ,ये गोरे अंग्रेज।

खूब करो सरहद रखवाली  , रख तलवारें तेज ।।

*

आप कभी हिम्मत ना हारें,  साहस ना दें छोड़ ।

बात भला क्या एक करोना  , जग में रोग करोड़ ।।

*

कर गया हाथ हजार वाला,उल्टे सीधे काम ।

मुंह ढाप के अब है सोना ,दर्शन दुर्लभ राम ।।

*

यहां भला हो किसे शिकायत  ,कोई क्यूं नाराज। 

है नगरी सारी  माया की।  ,सब के सर में ताज ।।

*

 संभावना बढ़ती बारिश की, बाढ़ नदी संकेत।

देखूं तुझको किसान बैठा ,कौन देखता खेत।।

*

दांवपेंच सब है कानूनी , फसलों को आघात।

घिसता  किसान अपनी जूती ,पागल के अनुपात ।।

*

 मारा हुआ वक्त के हाथो ,ये बचा बदनसीब।

है जिंदगी लाचार वंचित ,गिनती बढ़ा गरीब ।।

*

सुशील यादव


 पहले जैसा अब कहीं,होता नहीं कमाल

 फँसा धोखे शेर हो, चूहा कुतरे  जाल


कभी उतरता  ही नहीं, सत्ता गजब बुखार

बारह बरस पोंगरी, अजमा ले सरकार

सुशील यादव दुर्ग