Friday, 16 September 2022

 1

बेटे से पद छीनता,कितना बाप कठोर  I यौवन ययाति सा मिले,बात यही पुरजोर II


 



2

पिता पुत्र से बोलता ,देखो वीर सपूत  I सायकल तुझे सौप दूँ ,और निकाल सबूत II





3

सब की है ढपली यहाँ ,सबके अपने राग  I ढोल-नगाड़े     पीटना ,सुर जाए जब जाग II






महसूस नहीं हो हमे ,कतरो ऐसे पंख  I महा-समर आरंभ हो ,बज जाए फिर शंख II


 



4

फिर चुनाव आना हुआ,निकले वन से राम  I हर बगल है छुरी दबी,रखो काम से काम II


 



5

मानवता की आड़ में,दानव रहा दहाड़  I आशंकाओं का कहीं, गिरे न मित्र पहाड़ II





6

आज आदरणीय परम,रूठ गए हैं आप  I              लायक अपने पूत से ,रूठा करता बाप II


 



7

आहत मन से देखते ,कुछ अनबन कुछ मेल  I सायकल की अब मान घटी ,पटरी उतरी रेल II


 



8

बेटा करता बाप से ,विनती और गुहार  I           दिलवा दो अब सायकिल ,पंचर दियो सुधार II


 



9

लिखने वाले लिख रहे ,तरह तरह आलेख  I सबके अपने मन-गणित,अलग-अलग उल्लेख II


 



10

विकसित होते राज में,है विकास की गूंज  I     एक दूजे टांग पकड़,तंदूर वहीं भूंज II


 



11

कॉलर नही कमीज में,पेंट नही है जेब  I                नँगा होने तक रचो,कोई नया फरेब II


 



12

उम्मीदों के दौर में ,तुम भी पालो ख़्वाब  I कैशलेस हो खोपड़ी,'बाबा छाप'खिजाब II


 



13

पंछी बैठे छाँव में,उतरा दिखे गुरूर  I आसमान ऊंचाइयां,कतरे पँखो दूर II


 



14

साल नया है आ रहा,हो न विषम विकराल  I संयम उर्वर खेत में, बीज-व्यथा मत डाल II


 



15

घटते-घटते घट गया ,पानी भरा तलाब  I तनिक ओस की चाह में ,चाटो अपने ख्वाब II


 



16

माया कलयुग में जहां ,दिखे नोट की छाप  I सार दौलत बटोर के ,हुए वियोगी आप II


 



17

इस सूरत का आदमी,पायें कभी-कभार  I     बिना-गिने ही नोट को,सौपे गंगा धार II


 



18

दंगल दिखा कमा गए ,भारी भरकम नोट  I प्रभु हमारे दिमाग वो ,फिट कर दो लँगोट II


 



19

नोट-काले जेब रखे ,उजली बहुत कमीज  I    तू भी राजा सीख ले ,धनवान की तमीज II


 



20

कितनी है संभावना ,फैला देखो पाँव  I        सीमित होती आय की,चादर जिधर बिछाव II


 



21

अंग-अंग सारा टूटता,छलनी हुआ शरीर  I कब छोड़ोगे बोलना ,अपना है कश्मीर ... II


 



22

तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूत  I आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत... II


 



23

देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर  I ऊपर ने बुन क्या दिया,उलझी सी तकदीर II


 



24

लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर  I खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर II


 



25

मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर  I       चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर II


 



26

जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान  I चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण II


 



27

तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम  I      मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम II


 



28

मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर  I चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर II


 



29

आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर I         तब-तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर II


 



30

तिनका-तिनका तोड़ के ,रख देता है आज  I है कहीं अकड की बस्ती ,फिजूल कहीं समाज II


 



31

परिभाषा देशहित की ,पूछा करता कौन  I बहुत खरा एक बोलता ,दूजा रहता मौन II


 



32

भव-सागर की सोचते ,करने अब की पार  I गए निकल चुकाने तभी ,गिन-गिन कर्ज-उधार II


 



33

गया उधर एक मालया ,हथिया के सब माल  I किये हिफाजत लोग वे ,नेता, चोर, चंडाल II


 



34

 कभी देश की देख गति ,है कितनी विकराल  I यथा शीघ्र अब जीम के ,खाली कर पंडाल II


 



35

मुह क्यों अब है फाड़ता ,कमर तोड़ है दाम  I किसको कहते आदमी ,चुसा हुआ है आम II


 



36

 मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर  I चरण धूलि माथे  लगा ,चन्दन , ज्ञान-अबीर II


 



37

 जिससे भी जैसे बने, ले झोली भर ज्ञान  I आलोकित जग जो करे ,मगज रखा सामान II


 



38

 एक  जुलाहा हुआ चकित ,देख सूत कपास I   तन से ताना क्या बुने,मन बाना विश्वास II


 



39

 हम जिसको समझा किये ,अपने बहुत करीबI वो ही आखिर बन गया , आड़े प्यार रकीब II


 



40

 मन भंवरा मंडरा रहा , तुझे समझ के फूल  I यही अक्ल की खामियां ,बचपन मानो भूल II


 



41

 मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम में बौर  I बिन तुझसे मिल-भेंट के ,हलक न उतरे कौर II


 



42

तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूतI आत्मचिंतन  सुई  पकड़,ज्ञानी डाले सूत II


 



43

 देख जुलाहा हाथ की ,  तिरछी-खड़ी लकीर  I ऊपर से बुन क्या दिया,विरासत कि तकदीर II


 



44

लोह ताप से  भूलता ,अपनी खुद तासीर  I खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर II


 



45

  नफरत के इस कुम्भ में,खोज प्रेम लेवाल  I  जिसके भीतर 'मै' घुसा,उतरे तो वह खाल II


 



46

जड़ गया वो माथे में ,मुझसे जुडा सवाल  I  ले हाथो में उस्तरा , बजा गया जो गाल II


 



47

गली-गली में जीत का, सिक्का तभी उछाल  I अगर खजांची बाप हो ,घर में हो टकसाल II


 



48

माथे को क्यों पीटना ,होता किसे  मलाल  I देने वाला देखता ,है छप्पर  किस  हाल II


 



49

दिन-रात कौन पूछता ,एक सरीखा सवाल  I ले हाथो में उस्तरा , बजा रहे क्यूँ गाल II


 



50

लिखिए कुछ ऐसा मनुज,सज उठे वर्तमान  I हो टक्कर की  लेखनी ,रख  आत्मसम्मान II


 



51

कोलाहल हो 'जग' अगर,बनो  शान्ति के दूत  I ले चरखा फिर हाथ में ,सुख के कातो सूत II


 



52

वाणी में अमृत घुले, रहे  मधुर आवाज  I परिपाटी हो स्थापना , जिसको कहें रिवाज II


 



53

तुमसे क्या-क्या मांगता ,व्याकुल आज समाजI स्वर्ण नोक बना कलम ,पहना दो फिर ताज II


 



54

स्वारथ सभी  छोड़ दो ,त्याग दो अहंकार  I परमार्थ में जी लगा ,जानो तुम संसार II


 



55

बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय  I आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय II


 



56

खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून  I फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी  भून II


 



57

जाने कब से ढूढता ,भूली गुमी किताब  I शायद मिल जाए दबा,सूखा हुआ गुलाब II


 



58

डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल  I मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल II


 



59

लापता कहीं हो गई , पुत्र-मोह ललटेन  I मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन II


 



60

ओढ़ पहन के बैठना, नैतिकता की खाल  I जनता केवल है खड़ी,चौरहे बेहाल II


 



61

फूटे करम बिहार के,साथ नहीं कंदील  I         जो अन्धेरा देखती ,पैरों कांटे  कील II


 



62

संकट में हो निकटता,रखना दुःख क्षण नेह  I ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक  देह II


 



63

कितना लगता है बुरा ,गिनती के दिन चारI इभन-आड के फेर में ,ताक रहे इतवार II


 



64

डोर न ढीला छोड़ना ,प्रीत पतंग उडाय I    बिन मागे कुछ तो मिले,मांग के कछु न पाय II


 



65

 उलझे मन की बात ये ,कभी न सुलझी डोर  I रात करवटें ले कटी ,झपकी आती भोर II


 



66

 जनता की दरबार है ,जनादेश सब होय  I राज-रंक पल में करे ,आप न समझे कोय II


 



67

 मोदी तेरे राज में ,दीन -दुखी हैं लोग  I अच्छे दिन बुखार चढ़य,बुरे दिनो के रोग II


 



68

व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष  I हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश II


 



69

जिस दिन से बन्दी  हुआ,साधू लिपटा भेष  I इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष II


 



70

पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद  I बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद II


 



71

जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार  I     जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार II


 



72

सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास ।  I बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश ।।  


 



73

मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल  I अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल II


 



74

राहत जिसे मिला नहीं ,ये वंचित से लोग ।  I छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग ।। 


 



75

मन के भीतर मच गया ,सुबह-सुबह कुहराम I तन के खातिर नाम को ,माया मिली न राम ।। 


 



76

एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर I   असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर ।।   


 



77



 



78

हाथ लगी जब चाबियां ,निकले  नीयत खोर  I बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर   II


 



79

अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान  I मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान   II


 



80

सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन  I जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन   II


 



81

मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक  I         कौन बताए कब हुआ ,असली राजा रंक  II


 



82

सौदागर ये वहम के ,जीना किया हराम  I छुरी लेकर घूमते ,बगल रखे हैं राम  II


 



83

उम्मीद लगा बैठते ,गुठली के हों दाम  I      सीख गए वे  बेचना ,बात-बात में राम   II


 



84

आते-जाते रह गए ,हम सब उनके द्वार  I जिसका तय था हो गया ,जी भर के उद्धार  II


 



85

मौन रहा करता सदा,साधना सतत लीन.  I जाने कहाँ खिसक रही,पैरों तले जमीन।।   II


 



86

रहते हैं  सोए सभी,जनमत हरदम लोग  I कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग  II


 



87

दोहा सादा मंच पर ,दंगल हो शालीन  I किसकी चेतना बैठती ,सने पांव कालीन  II


 



88

दोहा देखो मंच पर ,दंगल में तब्दील ।  I कोई भगत भभूत से ,धूमिल है कंदील ।।  II


 



89

धीरे-धीरे ही छूटता,गुरु देव का साथ  I         कानो अब भी गूंजता,खोलो बेटा हाथ II


 



90

एक अजूबा है यही ,दूजे का क्या काम  I   माया जिसको मिल गई,सूझे उसे कब राम  II


 



91

जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज  I वैभव सारा रह गया ,पड़ी काल की गाज  II


 



92

मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम  I     मन थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम II


 



93

इस जीवन  में आपको,मिले खुशी भंडार  I पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार II


 



94

कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार  I पहचान करे आप की ,मानव पर  उपकार II


 



95

मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश  I नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश II


 



96

उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश  I निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती  खामोश II


 



97

जिंदगी कौन तुझसे, मसखरी कर सका  I     लड के कहाँ उम्र,अपनी बड़ी कर सका II


 



98

खुद वजूद से भटकते रहता है आदमी  I     आप-स्वयं से कब, यायावरी कर सका II


 



99

तिलस्म दिखे हैं होते कई, यहाँ साहेबान  I बिगड़े रिश्तो में कौन, जादूगरी कर सका II


 



100

निपटना तो अभाव से ,आएगा ही कभी  I क्या मजाल कोई उड़न- तश्तरी कर सका II


 



101

एक बार पहना ,इस्त्री किया कोट वो  I       जस का तस कब दुबारा उसे घड़ी कर सका II


 



102

जिस अदालत हैं बेजान से हलफनामे वहां  I तेरा मुंनशिफ तुझे कितना बरी कर सका II


 



103

खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन।  I हर करतूत मियाद पर,पाती सजा यकीन ।। II


 



104

जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार।  I          बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।। II


 



105

आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल।  I भगवा-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।। II


 



106



 

एक अधम से काम ने,औरो की ली जान।  I कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।। II


107



 



108

मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत  I राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत II


 



109



 



110

गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार  I         कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार II


 



111

प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन  I मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन II


 



112

बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन  I      पानी पानी ढूढते,नीचे पैर  जमीन II


 



113

मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम  I    सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम II


 



114

मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग  I जलते जलते बच गया ,आहत  अमन सुहाग II


 



115

विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम  I प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम -- II


 



116

एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार  I       बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार II


 



117

वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर  I भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर II


 



118

लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ  I      पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ II


 



119

आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीनI तेरे पन से तू मिटा ,बदला वहम- यकीन II


 



120

लक्ष्य निशाने  साधिए ,शीतल वचन समीर  I हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर II


 



121

सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर  I तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर II


 



122

आशा का दीपक जला,तम में हुआ अधीर  I शांत रहो उजला दिखे,हिंदी की तस्वीर II


 



123

हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन ।  I मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।। II


 



124

पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार I कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार  II


 



125

जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास I  फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस II


 



126

मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल  I                कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल II


 



127

बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल  I            साफ  सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल II


 

 


128

 कर ले कुछ तो नेकियाँ ,कहीं  कुए में डाल  ।  शायद  दुर्दिन में  यही , तेरा रखे खयाल   ।।


 

  


129

दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल  ।         डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल  ।।


 

  


130

निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम  ।     इस माया संसार का,किसके पास लगाम  ।।


 



131

 


 

रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग  ।       कौन मिटाने आ सका, पाँच साल का रोग  ।।


132

  


 

नींद भरी थी आँख में,खुला रहा  लंगोट  ।     कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट  ।।


133



 

फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील  ।        किसको सूझे  देखना ,पैरों कांटे  कील  ।।


134



 

थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत  ।     सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत  ।।


135



 

अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल  ।  रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल  ।।


136



 

जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट  ।     उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट  ।।


137



 

ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को  सौगात  ।      निकले  कैसे  बाढ़ में ,थमने दो बरसात  ।।


138



 

आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान  ।  फिर से लंका जीत ले ,थका हुआ हनुमान  ।।


139



 

खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले  जमीन  ।  कल जो तू सरताज था,खारिज आज यकीन  ।।


140



 

जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम  ।      जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम  ।।


141



 

भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग  ।      भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग  ।।


142



 

इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार  ।       नेताओ  के रूप में   ,निभा रहे किरदार  ।।


143



 

मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान   ।     उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान   ।।


144



 

सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान   ।  लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान   ।।


145



 

पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम   ।  आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम   ।।


146



 

ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान   ।  तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर  बदजुबान   ।।


147



 

सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान  ।     मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान  ।।


148



 

बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल  ।     वादा  टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल  ।।


149



 

सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार   ।  चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार   ।।


150



 

पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार   ।  देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार   ।।


151



 

वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार  ।  अभी-अभी तो लौट हम,देखे  रंग हजार   ।।


152



 

मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार     दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार   ।।


153



 

संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान  ।  भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान  ।।


154



 

जनता बहती धार में ,बिखरा  टूट जहाज  ।      जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास ।।


155



 

किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश  ।     कल की आहत द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश  ।।


156



 

बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज ।  विश्वास अडिग आपसी ,उत्तम दान-दहेज  ।।


157



 

छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज  ।      भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज  ।।


158



 

भाई  तेरा प्यार ही,जीवन भर उपहार  ।     आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार  ।।


159



 

दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अबभीगोल। दीमक बन के खा  गई ,दीमागी भूगोल  ।।


160

 


 

लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास  । महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश  ।।


161



 

दूजे की ले ढपलियां,आप सुनाएँ राग  ।      संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग  ।।


162



 

ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह  । संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह  ।।


163



 

देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून  ।     काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून  ।।


164



 

कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे  रंक  ।    किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक  ।।


165



 

टाँग आपसी  खींचना, बन पंचायत खाप  ।    फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप  ।।


166



 

कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और  ।    रहने दो   हर बात को ,निजी आपसी तौर  ।।


167



 

कैसे  मूक बधिर रहे  ,बैठे थे खामोश  ।     सत्तर बीते साल तब ,आया हमको होश  ।।


168



 

कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम  ।    जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम  ।।


169



 

जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर  । खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर  ।।


170



 

राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द  ।     अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द  ।।


171



 

लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिमकाल। किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल  ।।


172



 

धुंआ- धुआ होता रहे ,मन उपजा संदेह  ।     बन मे सूखी लकडियाँ ,घर मे सुलगे देह  ।।


173



 

ताने से तन ढांक ले ,बाने से मन भूत  ।      मौन जुलाहा कह गया ,ले धागा औ सूत  ।।


174



 

पीढी को जो तार दे ,अकेला हो सपूत  ।     साई कभी करो जतन ,दे दो राख भभूत  ।।


175



 

यश -अपयश सब साथ है ,भले-बुरे के संग  । लकड़ी मे जस घुन लगे ,लोहे मे  तस जंग  ।।


176



 

राम -रहीम दुआर मे ,कौन गरीब -अमीर  ।     तू भी बन के देख ले ,पंडित ,पीर फकीर  ।।


177



 

जिसके भीतर 'मै' घुसा ,उतरे तो वह खाल  । नफरत के इस कुम्भ मे ,खोज प्रेम लेवाल  ।।


178



 

ले हाथो मे उस्तरा ,बजा गया वो गाल  ।      मेरे माथे जड गया ,मुझसे जुडा सवाल  ।।


179



 

उपर वाला देख रहा,छप्पर है किस हाल  ।     मत माथा अब पीट तू,कर मत तनिक मलाल  ।।


180



 

तन से क्या ताना बुने ,मन बाना विश्वास  ।    एक जुलाहा है चकित ,देखे सूत-कपास  ।।


181



 

आखिर मे बन वो गया ,आडे प्यार रकीब  । जिसको हम समझा किये ,मन के बहुत करीब  ।।


182



 

यही अक्ल  की खामियां ,बचपन मानो भूल  । मन भौरा मंडरा रहा ,तुझे समझ के फूल  ।।


183



 

बिन तुझसे मिल भेंट के ,हलक न उतरे कौर  । मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम मे बौर  ।।


184



 

नेता झाड़ें दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार  ।     किस मिटटी के हो बने ,माधो  मेरे यार  ।।


185



 

शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात  ।    छोटे-छोटे  दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात  ।।


186



 

नेता  आकर जीम लो,कंबल वाली घूस  ।    अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस  ।।


187



 

बातो की बस  छूरियां,संकट रहता राम  । महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न  काम  ।।


188



 

मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल  ।    डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल  ।।


189



 

एक निशानी प्यार की ,रखो  जरा सम्हाल  ।    कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल  ।।


190



 

चल  विकास की बात कर, तुझको रोके कौन  । नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन  ।।


191



 

तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद  ।      नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद  ।।


192



 

कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल  ।     संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल  ।।


193



 

माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक  ।  राजा कभी न बन सका ,मन से रहता  रंक  ।।


194



 

मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग  ।  तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग  ।।


195



 

दुनिया  समझती है नहीं,नहीं समझते आप  ।  मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप  ।।


196



 

संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान  ।      शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान  ।।


197



 

सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल  ।      शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल  ।।


198



 

करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार  ।  साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार  ।।


199



 

भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल  ।      अपना सिक्का ढालने,बिठा रही  टकसाल  ।।


200



 

उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान  ।     दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान  ।।


201



 

खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज  ।  ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज  ।।


202



 

खाने को  मुहताज थे,अब है छप्पन भोग  ।    नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग  ।।


203



 

इतने सीधे लोग भी  ,बनते हैं लाचार  ।     कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार  ।।


204



 

दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात  ।  लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात  ।।


205



 

सरहद  रखवाली लगे ,अपने वीर जवान  ।  उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान  ।।


206



 

जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार  ।         बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार  ।।


207



 

सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास   ।     बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश   ।।


208



 

मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल  ।  अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल  ।।


209



 

मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम   ।  तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम   ।।


210



 

एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर   ।  असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर   ।।


211



 

व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष  ।     जिस दिन से बन्दी  हुआ,साधू लिपटा भेष  ।।


212



 

इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष  ।  आखिर में बन्दी हुआ ,साधू लिपटा भेष  ।।


213



 

अत्याचारी ज्ञात हो ,अवगुण रहे न शेष  ।     पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद  ।।


214



 

बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद  ।     जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार  ।।


215



 



216



 

सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर  ।  तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर  ।।


217



 

पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार   ।  कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार   ।।


218

अवसर तुमको है मिला ,पितर  करो सम्मान   ।  दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान   ।।


 



219

जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास   ।  फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस  ।।


 



220

मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल  ।              कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल  ।।


 



221

बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल  ।         साफ  सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल  ।।


 



222

जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग  ।        करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग  ।।


 



223

प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन  ।       मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन  ।।


 



224

मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम  ।      सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम  ।।


 



225

कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार  ।         जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार  ।।


 



226

फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार  ।      बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार  ।।


 



227

मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत  ।  राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत  ।।


 



228

जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज  ।     वैभव सारा रह गया ,गिरी  काल की गाज  ।।


 



229

एक अधम से काम ने,औरो की ली जान  ।  कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान  ।।


 



230

सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम  ।     छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम  ।।


231



 

नुकसान-नफा देख मत,बाबाओं के संग  ।      ज्ञान गया है भाड़ में,नोट कमाय दबंग  ।।


232



 

मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज  ।  दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज  ।।


233



234

सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन  ।  जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन  ।।


 



235

अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील  ।  व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील  ।।


 



236

मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक  ।      राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक  ।।


237



 

कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून.  ।      लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून  ।।


238



 

फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब  ।  लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब  ।।


239



240

जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और  ।  मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर  ।।


 



241

तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार  ।  काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन  दुश्वार  ।।


 



242



243



 

नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध  ।  अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध  ।।


244



 

मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग  ।  जलते जलते बच गया ,आहत  अमन सुहाग  ।।


245



246

विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम  ।  प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम --  ।।


 



247

एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार  ।      बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार  ।।


 



248

वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर  ।      भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर  ।।


249



 

लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ  ।      पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ  ।।


250



 

किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर  ।  कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और  ।।


251



252

पास हमारे  वोट हैं,करते तुम तकरार  ।     मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार  ।।


252



253

रावण करता  कल्पना, सोना भरे सुगन्ध  ।    पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध  ।।


254



254

सीढि स्वर्ग पहुचा सके  ,किया रावण विचार  ।  आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार  ।।


255



255

मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास  ।  कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास  ।।


256



257

कौन -कौन आ  बैठते,माया रूप जहाज  ।  ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज  ।।


257



258

बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच  ।      जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच  ।।


258



259

गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल  ।  जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल  ।।


260



260

आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल  ।  अगर कसैला स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल  ।।


261



261

सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग  ।      कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग  ।।


262



263

संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात  ।     जब ये आवें साथ में ,जगत  हुआ  बौरात  ।।


263



264

इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम  ।  भीतर फिर से झांक लो ,कितना साबुत  राम  ।।


264



265

इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक  ।     किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक  ।।


265



266

भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन  ।       मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन  ।।


267



267

संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह ।     ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह  ।।


268



268

   सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार  ।     साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार  ।।


269



270

इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास  ।  आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास  ।।


270



271

अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत  ।     यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत  ।।


271



272

कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप  ।  फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप  ।।


273



273

भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग  ।  सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग  ।।


274



274

अपने बस में अब नहीं ,बस में करना आज  ।  बिखरा है कुनबा सभी ,टूटा हुआ समाज  ।।


275



276

नोटबन्दी हुई वजह , हाथ  जरा है तंग  ।      वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग  ।।


276



277

ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप  ।  फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप  ।।


277



278

मन की जैसी धारणा ,वैसा रख  उत्साह  ।     एक जलन की आग से,घर-घर हुआ तबाह  ।।


279



279

बूढ़े बरगद ने पढा ,पोथी- ज्ञान किताब  ।     उल-जलूल तू ने लिखा ,पाता रहा खिताब  ।।


280



280

एक उधर संयोग था,एक यहां  संयोग  ।      हठधर्मी हथिया लिया ,राजपाठ बिन योग  ।।


281



282

दोहे तुम भी सीखना ,नौसिखिये हो यार  ।  हलन्त कामा,भूल की ,करना बाद विचार  ।।


282



283

सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख  ।        शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख  ।।


283



284

हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल  ।     कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल  ।।


285



285

कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग  ।  हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग  ।।


286



286

हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय  ।  झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय  ।।


287



288

हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन   ।  मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन   ।।


288



289

गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार  ।         कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार  ।।


289



290

गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार  ।  कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार  ।।


291



291

बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार  ।  सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार  ।।


292



292

बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर  ।  हाथ लगी जब चाबियां ,निकले  नीयत खोर  ।।


293



294

हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार  ।  जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार  ।।


294



295

रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब  ।  हलके  हमको ले रहे,होंगे भारी चीज  ।।


295



296

समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज  ।  हलके  हमको ले रहे,होंगे भारी चीज  ।।


297



297

नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर  ।  सोते से अब जागिये ,होने को है देर  ।।


298



298

पाखंडी-पापी  चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग  ।  हैरान यही  देखकर ,बदल न पाए लोग  ।।


299



300

मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम  ।  हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम  ।।


300



301

सौ बार लुटे गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव  ।  अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव  ।।


301



302

किसी  ड्राइंग रूम का ,बिगड़े ना कालीन  ।  हममे ये संस्कार हो  ,होली हो शालीन  ।।


303



303

हर दुविधा  के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत  ।  लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत  ।।


304



304

मन थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम  ।  मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम  ।।


305



306

पहचान करे आप की ,मानव पर  उपकार  ।  कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार  ।।


306



307

नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश  ।  मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश  ।।


307



308

निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती  खामोश  ।  उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश  ।।


309



309

पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान  ।  रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान  ।।


310



310

ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला  ।  गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला  ।।


311



311

गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता  ।  इसीलिए केवल यही ,इशारों में  कहता  ।।


312



313

पाखंड-पाप चांटते ,छप्पन- छप्पन भोग  ।  हैरान यही  देखकर ,बदल न पाए लोग  ।।


313



314

बाहर कहीं बहार है,चार तरफ तितलियाँ  ।  छप्पन-छप्पन भोग,रहे घी में उंगलियां  ।।


314



315

खेलो खाओ लूट लो,लोग हैरान नहीं  ।  हांफ रहे क्यों आज भी,देख मैदान वही  ।।


316



316

जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल  ।  गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल  ।।


317



317

है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे  ।  पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे  ।।


318



319

आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार  ।  सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार  ।।


319


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