Friday, 12 May 2023

 पहले जैसा अब कहीं,होता नहीं कमाल

 फँसा धोखे शेर हो, चूहा कुतरे  जाल


कभी उतरता  ही नहीं, सत्ता गजब बुखार

बारह बरस पोंगरी, अजमा ले सरकार

सुशील यादव दुर्ग


Saturday, 24 September 2022

कॉपी दोहे

मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान | नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ या भाग राजनीति की मिर्च अब ,लगा रही है आग नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार दीमक बन के खा गई ,दीमागी भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग दूजे की ले ढपलियां,आप सुनाएँ राग संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह -- होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौंक मन माफिक तो चर लिया,बिन बघार बिन छौंक किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक -- फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप -- चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट हैरत दे खैरियत,पूछे कभी न चोट -- रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट -- ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात -- दुनिया समझती है नहीं,नहीं समझते आप मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल अपना सिक्का ढालने,बिठा रही टकसाल हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान खाने को मुहताज थे,अब है छप्पन भोग नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग इतने सीधे लोग भी ,बनते हैं लाचार कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात सरहद रखवाली लगे ,अपने वीर जवान उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल राहत जिसे ,ये वंचित से लोग छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश जिस दिन से बन्दी हुआ,साधू लिपटा भेष इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीन तेरे पन की महक से ,इतरा रही जमीन लक्ष्य निशाने साधिए ,शीतल वचन समीर हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार वे तर्पण याचक नहीं ,सहज बात संस्कार अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान जिनकी संगति में पले , वैतरणी का ज्ञान फुर्सत का तर्पण करें , यही पितर सम्मान लिख के लाये लोग सब ,अपने-अपने लेख तेरी कृपा रुकी हुई , दिल्ली जाकर देख हर कोई क्यो मारता,बात-बात में लात जुटा हुआ है आदमी ,कोल्हू के हालात हर कोई है जनता,मेरे मन की बात केवल तुझे पता नहीं ,कैसे बीती रात कफस-कफस खाली मिले, पंछी हो आजाद हर कोयल की कूक में,रहे न कुछ फरियाद आओ हम मिल बांध दें ,अफवाहों के पैर। दो गज दूर नहीं चले, बिन मकसद के बैर एक करोना व्याधि से ,जग सारा भयभीत शक की नजरें घूमती ,कण-कण में मनमीत एक करोना से मचा,दुनिया मे कुहराम मुझको अल्ला से शिफा, तुझे बचाए राम जाने कैसा मच गया ,धकधक हाहाकर तूफानों के बीच में ,किसका बेड़ा पार देखे अपनों के यहाँ , बदले- बदले रंग बेबस मन को तौलते ,दुविधा के पासंग .. लोगों की पहचान में , हो जाती है देर खुशकिस्मत अंधे यहां ,जिनके हाथ बटेर .. मैं हूँ अपने आप से , इधर बहुत नाराज सूरज सुख का ढल गया , नींद खुली लो आज .. सुधियों के आंगन कभी ,रहती थी मुस्कान हुआ यहींS मन लापता ,खोकर खुद पहचान .. शायद मेरे मर्म तक ,पहुँच न पाते आप. मेरे कद का इस लिए , लेते रहते नाप.. इस बहाव में क्या करें ,जल के भीतर मीन. जाना था जापान तो ,पहुच रही है चीन.. संभव सा दिखता नहीं , रुके कहीं बहाव. लौट चले लेकर हमी,अपनी टूटी नाव.. जब भी छूती ये नदी , खतरा क्रूर निशान. बह जाता है साथ में,हाथो का सामान.. सावन का अंधा हुआ . हरे -हरे की सोच. हरी-हरी के जाप में , भूलो कण्टक मोच.. सावन का अंधा हुआ ,सोच हरा चहुँ ओर. बिगड़ी शायद यूँ बने ,जोर लगा कुछ और.. केवल इतना ध्यान रख , होय नहीं अभिमान. तीर वहीं हो लक्ष्य में , मछली आँख निशान.. हरि अर्जुन को दे गए ,गीता में सन्देश. रण में जो है सामने ,न बन्धु- सखा नरेश.. दुविधा के हर मोड़ पर ,देता था जो ज्ञान. कृष्ण बना था सारथी , तज कर तेज महान.. लीला जिसकी देख के ,चकित विश्व सब ओर. ऊँगली में पर्वत उठा , रोका बारिश जोर.. राजनीति में जो निपुण, किया अधर्म विरोध. हम ऐसे प्रभु कृष्ण पर , करे सार्थक शोध.. बिगड़ी बात बनी नहीं , सावन बीता जाय. मेरे संकट काल को , कौन दिशा बतलाय.. जरासंघ अपराध हो , या रिश्तों में कंश. गर्व मीन को ले उड़े , काल- समय का हंस.. दिखता मुझको सामने , हर कोई नाराज. जिसका बिगड़ा कल रहा ,कैसे सुधरे आज.. राम नाम की नाव थी ,खेने बाला ख़ास. रामायण पहुचा गया , घर-घर तुलसीदास.. असमंजस मन्दोदरी,समझाती थी नेक सन्धि -सुलह हो नाथ अब , दृढ़ता से जिद फ़ेंक वानर -दल की वीरता ,आई हरदम काम लंका जलती रह गई ,छूटी पकड़ लगाम रंग अबीर गुलाल का ,सीखो शिष्टाचार केवल उस पर डालना,जिस पर हो अधिकार इस होली में तंज का ,करना नही प्रयोग अपने -अपने हाल में,भड़के बैठे लोग पल भर में ही ढह गये ,महलें आलीशान नफरत की थी होलिका,आतंकी तूफान उस घर मे भी झांक लो,जहां नहीं कुछ शेष मरहम पट्टी प्यार दो ,छोड़ो नफरत द्वेष जाने कैसे कर गया ,मुझ पर कौन प्रयोग कॅरोना ग्रसित मैं हुई ,प्रेम व्यथित संयोग बदला बदला सा लगे , मायावी व्यवहार समतल नित मैदान में,व्यापक मचा प्रहार दरवाजे सब बन्द हैं , ईश सभी नाराज तू भी रख तैयारियां , गिरने को है गाज जब तक आकर जायगा, एक बड़ा तूफान हिल जाएगी नीव ही , जहां खड़ा इंसान व्यापक अर्थ नसीब का , जान सका ना कोय पछतावा आँसू बिना, कर्म अकारथ होय खेल खेल में डूबना, कैसे होता यार लोग चार फांसी चढ़े, जाने ये संसार मन की सारी धारणा,हो जाती निर्मूल जड़ें करोना बेधती,बन संकट के शूल कोई भी ज्ञाता नहीं ,क्या उपाय अनुकूल अंध भक्ति विश्वास ही,दें प्रभाव प्रतिकूल बचना बारिश से तुझे ,अपनी छतरी तान इस क्रोना बौछार में , केवल दूजे की मान उड़ती पतंग खूब ये , देते जाना ढील समझौतों की डोर कम, नभ में उड़ती चील एक अकेला हो गया , भीड़ बीच इंसान खींचे प्रभु ने हाथ अब ,निद्रा-मग्न भगवान तेरा इलाज जानता , कितना वैद्य- हकीम बस इतनी है खैरियत , मुश्किल के दिन तीन सर पर इतना बोझ तो ,अक्सर सहता पेट पर बचपन को काम में,चढ़ा रहे क्यो भेट मन्दिर अब सूना हुआ ,मधुशाला में भीड़। कोलाहल के बीच में, कोयल की है नीड़ मदिरालय में शोर है,मन्दिर है सुनसान ये कलयुग की आस्था , युग का है अवसान कठिन काम मेहनत से,करें श्रमिक सब लोग। उस श्रम का हम आम जन, जान सकें उपयोग श्रम की जननी पेट है ,इसका रखना ख्याल करो कारखाने से तभी,पैदा इच्छित माल रब से मांगू ये दुआ ,बस्ती हो खुशहाल। सबकी लम्बी हो उमर ,जी लें सालों साल जाने कितने शह मिले, कितनी खाई मात बता गया कोविड हमे , पल भर मे औकात कौन छीन कर ले गया, तेरा सब्र करार... तारे दिन मे देखती,अजब हुआ संसार.. दुनिया पीछे है पड़ी,धोकर अपने हाथ अब क्या और बिगाड़ती,आती वापस नाथ। अपने-अपनो ने लिया ,मिल-जुल सब कुछ बाँट एक करोना बच गया ,बन के टाई नॉट पँछी नहीं है डाल में,पथिक नहीं है राह रहबर भूखे मर रहे, राहजनी की चाह राहजनी की चाह, लोग जाने-पहचाने किसे भगाएं मार,घरों के सभी सयाने जन-जन लापरवाह हैं, दौड़ पड़ेगी भीड़। सोच-समझ के खोलना,नाजुक डाली नीड़ आज करोना त्राण से, करता हूं आगाह। भूले से मत खोलना, बोतल जिन्न गुनाह चला न जाये जब तलक ,दरवाजे से दूर तुम भी कहां बजा सको,अमन-चैन सन्तूर छोड़े हैं घर- बार हम ,छूटा सारा गांव। जाने अब किस हाल में,मिले वापसी नाव भविष्य तो अँधकारमय,क्या ठीक वर्तमान। भूसे में तिनका गुमा,दोष किसे यजमान बना दिया दिन आलसी,रातें हैं नाकाम किसको रख लें काम पर,किससे मांगे काम दुविधा में बेसुध हुए ,नहीं योग व्यायाम अंग लगे खाना कहाँ,निष्फल चारो धाम अपने मन की अब कहो, डूबा खड़ा जहाज पी लें कुंआ खोद के,अब वो नहीं रिवाज पँछी नहीं है डाल में,पथिक नहीं है राह फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल एमए- बिए का करौं,ओमे हे पिचकाट अतका जबर हवे नहीं ,दद्दू हमर ललाट करोड़ बारह सौ फूंके हैं ,बांटे मोबाइल सरकार गंवार-अपढ़ जनता होवे,मोबाइल की क्या दरकार जिन गावो में भूखा प्यासा,खेती करता दिखे किसान मोबाइल उन हाथो देकर,तुम समझो खुद धन्य महान नक्सलवादी वहीँ जमे हैं ,ले पैसा इस नाम अकूत रोजाना ताबूत भेजे जाते ,भारत वीर जवान सपूत किस मिटटी के तुम हो माधो ,ह्रदय तुम्हारा हाय कठोर विपदा- संकट रखते साथी ,नेता- अफसर चिन्दी चोर कौन योजना के बलबूते ,होगी अब की नैय्या पार जनता और भरम में डालो ,कर लो फिर से छल व्यापार विकास मुद्दे चुनाव गायब , कहो राज के तारणहार मोबाइल दे के लूट रहे , सरकारी संचित भंडार पढ़ने वाले बच्चो को देकर ,करते यहां गहन अपराध भटकाने-दौड़ाने पथ में ,छोड़ दिए हो क्रोधित बाघ जनमत को अब मत भटकाओ,देना होगा सभी हिसाब बन्द करो ये दारू खाने, मुफ्त बांट चुनावी शराब बारिश में अब भीगना ,होता है हर रोज डूबी अपनी नाव कब ,किधर करें हम खोज अपने-अपने दंभ को ,भूल-बिसर के आज शामिल होली में रहो ,जुड़ता दिखे समाज फागुन-फागुन सा हुआ ,सावन बिछुड़ा मीत छोड़ अधर की बासुरी ,राधा विरहा गीत कायरता की राह में ,हद से निकले पार माया जननी मोह की,देख यही संसार पद प्रतिष्ठा वो छोड़ के ,सड़कें नापे रोज कीचड़-कीचड़ में खिले ,पंकज,कमल,सरोज देख तुम्हारी सादगी , हाथो बचा गुलाल जीवन सारा काट दे ,इतनी सोच मलाल संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास कल थे वे जो रूबरू ,जन सेवक बन बीच आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच रेखा कभी- कहाँ खिंची,परंपरा के खेल देखो जला मशालची,जितनी-जी भर तेल अवगुन पीछे छोड़ कर ,गुन की करे बखान राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर

हम आजाद हैं

दोहे सुशील यादव हम आजाद हैं , -- मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान । उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।। -- सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान । लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।। -- पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम । आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।। -- ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान । तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।। -- सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान -- सुशील यादव जाने कैसे लोग ये .... # खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन। हर करतूत मियाद पर,पाती सजा यकीन ।। ## जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार। बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।। ## आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल। भगआ-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।। ## जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज। वैभव सारा रह गया ,गिरी काल की गाज।। ## एक अधम से काम ने,औरो की ली जान। कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।। ## सुशील यादव कुछ दिन तो गुजारो .... --- सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार | चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार || ---- पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार | देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार || --- वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार| अभी-अभी तो लौट हम,देखे रंग हजार || --- पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार| मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार || --- मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार | दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार || --- सुशील यादव दुर्ग शहर मचा कुहराम... ## सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम। छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम ## सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार ## नुकसान-नफा देख मत,बाबाओं के संग ज्ञान गया है भाड़ में,नोट कमाय दबंग ## मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज ## सुशील यादव अफवाहों के पैर में .... सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन # अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील # अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान # मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक # हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर सुशील यादव ,दुर्ग बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल साफ सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल # बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन पानी- पानी ढूढते,नीचे पैर जमीन # मंदिर- द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम फिर थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम # गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार # जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग # प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन # मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम # कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार # फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार # मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत # बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल # कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून. लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून # समय यही माकूल है ,रह लो उस पासंग सोच समझ के तौलता ,भाई है बजरंग # आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान फिर से लंका जीत ले ,थका हुआ हनुमान # रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग # खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन कल जो तू सरताज था,खारिज आज यकीन # जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम # भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग # इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार नेताओ के रूप में ,निभा रहे किरदार सुशील यादव निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम इस माया संसार का,किसके पास लगाम --- निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम इस माया संसार का,किसके पास लगाम किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली हाथ इशारो पुलिस,उच्चके चोर मवाली ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला चोला है बैराग ,खरीदने जगत निकला सुशील यादव दुर्ग -- फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब -- जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार --- हैं खूनी छीटे पड़े ,पत्थर महज जनाब रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब --- जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर -- तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन दुश्वार --- हलके हमको ले रहे,होंगे भारी चीज समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज --- रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूँ तान पर ज्ञानी का गिर गया ,गर्व भरा अभिमान -- हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान सुशील यादव संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात जब ये आवें साथ में ,जगत हुआ बौरात इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम भीतर फिर से झांक लो ,कितना साबुत राम -- जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज लहरे ंभी करती कहाँ ,कितनी देर लिहाज सुशील यादव -- अपने मकसद डालता,देख परख के घास जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश कल की आहात द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश 2.8.17 किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश कल की आहात द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश सामयिक दोहे ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल -- आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार -- दीमक बन के खा गई ,दीमागी भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल *** भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन -- रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच सुशील यादव सामयिक दोहे 3 पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग अपनी ढपली बजा रहे ,खुद अपना राग सुशील यादव राखी के दोहे बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज विश्वास अडिग आपसी ,उत्तम दान-दहेज छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज सोने मांगू बालियां ,नही मोतिया हार भाई तेरा प्यार ही,जीवन भर उपहार सामयिक दोहे कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत ** ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ औ भाग राजनीति की मिर्च से ,लगती है जो आग ** नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट ** फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील ** थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत ** अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल सुशील यादव --- इस जीवन में आपको,मिले खुशी भंडार पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार -- मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत -- नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध -- अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध नफरत के माहौल यूँ ,ढूंढो प्रेम सुगंध -- सोते से अब जागिये ,होने को है देर नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर -- मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग जलते जलते बच गया ,आहत अमन सुहाग सुशील यादव विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम -- --- एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार --- वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर -- लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास ## कौन -कौन आ बैठते,माया रूप जहाज ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज ## बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच ## गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल ## सुशील यादव आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल कसैला अगर स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल ## सुशील यादव सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग ## सुशील यादव किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार --- रावण करता कल्पना, सोना भरे सुगन्ध पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूँ तान टिका नहीं उस ज्ञान का,गर्व भरा अभिमान सीढि स्वर्ग पहुचा सके ,किया रावण विचार आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग कुंडलियां 1 हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग पाखंड-पाप चांटते ,छप्पन- छप्पन भोग छप्पन-छप्पन भोग,रहे घी में उंगलियां बाहर कहीं बहार है,चार तरफ तितलियाँ हांफ रहे क्यों आज भी,देख मैदान वही खेलो खाओ लूट लो,लोग हैरान नहीं 2 गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे पापी-लोभी-दुष्ट,व्यभिचारी बात बनती गली कहाँ ये दाल,रोटी की किधर गिनती सुशील यादव 3 सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें जब निर्धन के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे मन्नत की उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी सुशील यादव 4 टेलीपेथी ... बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना प्रीतम मिलती सीख,संग दुख के जब जीना दिखे ऊंच ही नीच ,सभी सुख आधार बिना ## 5 आज ... कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज नियमो भरा समाज ,उलंघन से छुटकारा नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है मौन कहाँ कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ सुशील यादव 6 खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून सब लो भट्टी भून,गड़े मजहब का झंडा रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा गौरवशाली देश ,निरा तू कंगाल रहा वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहा सुशील यादव दुर्ग 7 हैरान कहीं देखकर ,बदल न पाए लोग पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग छप्पन- छप्पन भोग,ऊँगलिया पाँचो घी में आस्था की ये लाश ,बहा दो कहीं नदी में रहते बेबस लोग,दिखे ना मुस्कान कहीं करती है ये बात ,मुझे बस हैरान कहीं @@@ 8 रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे सुशील यादव ### ९ रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला इसीलिए केवल यही ,इशारों में कहता गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता सुशील यादव संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह सुशील यादव रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच सुशील यादव *** काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून सुशील यादव *** होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक जितना चरना चर लिया ,बिन बघार बिनछौंक सुशील यादव ** होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक मन माफिक तो चर लिया ,बिन बघार बिन छौंक **S किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक *** फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप सुशील यादव ** चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट हैरत देके खैरियत,पूछे कभी न चोट ० रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और % दीमक बन के खा रही ,दिमाग का भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल *** दीमक बन के खा रही ,दीमागी भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल *** भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन सुशील यादव ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ औ भाग राजनीति की मिर्च से ,लगती है जो आग # कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत # नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट # फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील # थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत # अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल # जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट # छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज # ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात # सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार संकट में हो निकटता, दुःख के क्षण हो नेह ख़ुशी-ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक ये देह आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार आगे-आगे मैं झुकूं ,तेरे पालनहार # बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज पाकर भाई धन्य हूँ ,उत्तम दान-दहेज # इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास # चुनाव-रथ में बैठकर ,देने को सौगात निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात # अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव सौ बार लुटे गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव # अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत @@ कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप # भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग # अपने बस में अब नहीं ,बस में करना आज बिखरा है कुनबा सभी ,टूटा हुआ समाज # हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन किसी ड्राइंग रूम का ,बिगड़े ना कालीन # कितनी करके नेकियाँ ,दिए कुए में डाल अगर बचा हो आब तो,तू ही जरा निकाल # नोटबन्दी हुई वजह , हाथ जरा है तंग वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग # ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप ## मन की जैसी धारणा ,वैसा रख उत्साह एक जलन की आग से,घर-घर हुआ तबाह # हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन ड्राइंग रूम में रखा ,बिगड़े ना कालीन # बूढ़े बरगद ने पढा ,पोथी- ज्ञान किताब उल-जलूल तू ने लिखा ,पाता रहा खिताब # कितनी करके नेकियाँ ,दिए कुए में डाल अगर बचा हो आब तो,तू ही जरा निकाल # हुई नोटबन्दी वजह , हाथ जरा है तंग वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग # होली जैसी गालियां ,आम हई सब ओर कहो इसे हुड़दंग या ,कहो चुनावी शोर # लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत हर दुविधा के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत #

प्रभु

खुद को शायद तौलने,मिला तराजू एक समझबूझ की हद रहें, खोये नहीं विवेक आये हैं अब लौट कर . हम अपने घर द्वार दुविधा सांकल खोल दो ,प्रभु केवल इस बार खाने को मुहताज थे,अब है छप्पन भोग नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन भोग खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज ap भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल अपना सिक्का ढालने,बिठा लिए टकसाल तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल हाथो में चिनगारियां ,फुलझड़ियों के नाम बारूदी बस्ती हुई ,सरहद है बदनाम सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख काटों का मौसम कभी ,हो जाए अनुकूल वेलेंटाइन तुम भेजना ,मुझे pyaar फूल हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल अपनी चाहत तोड़ ले ,दिखे गुलाबी फूल

राधिका 2

एक शराफत आइना , समझ दिखा यार चल- फिर सके मरीज या,बेसुध-बीमार दुश्मन से मिलकर कभी, पूछ कुशल क्षेम सरहद में ललकार हो ,सही देश प्रेम बीत बरस सत्तर गए ,लाये हुए सुराज आओ अतीत झांक लें,बूढा दिखे समाज सब बत्तीसी झड़ गई ,अकड़ गई है भाग झुकी कमर लाचार सा,बूढा दिखे समाज गांधी ! मिल घर गोडसे ,पूछते कुशल क्षेम इसे नोट महिमा कहें ,या मानवता प्रेम ये तुम्हारे सोच की कौन सी फ़स्ल है ज़िंदा लाशें हर तरफ बेजान नस्ल है मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव अगर छलकता ज्ञान हो ,रखो उसे सम्हाल दुर्गति के आरंभ में ,करें जांच -पड़ताल बार-बार गलती वही ,दुहराते हो मित्र शायद दुविधा के कहीं ,उलटे पकडे चित्र मेरा 'पर' मत नोचना,बाकी बहुत उड़ान रहते हुए जमीन पर , नभ की चाह समान सुशील यादव इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार नेताओं के रूप में ,निभा रहे किरदार उम्मीद लगा बैठते ,गुठली के हों दाम सीख गए वे बेचना ,बात-बात में राम एक शराफत आइना ,ले के बैठे यार दुनिया रही कराहती ,तुम न कहो बीमार खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज साल नया है आ रहा,हो न विषम विकराल संयम उर्वर खेत में, बीज-व्यथा मत डाल तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूत आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर ऊपर ने बुन क्या दिया,उलझी सी तकदीर लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर करें प्रेम की याचना ,मिल जाए तो ठीक वरना दुखी जहान है ,आहिस्ता से छींक आये हैं अब लौट कर . हम अपने घर द्वार दुविधा सांकल खोल दो ,प्रभु केवल इस बार आये हैं अब लौट कर . हम अपने घर द्वार दुविधा सांकल खोल दो ,प्रभु केवल इस बार पांच बछर धर घुमत हन,आवेदन फरियाद बिना फसल डारन कती ,खातु करम के खाद टूटे मन के मोहरे ,चार तरफ से तंज कैसे दुखी बिसात पर ,खेले हम शतरंज बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल।। वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल।। संयम की मिलती नहीं,हमको कहीं जमीन लुटी-लुटी सी आस्था ,है अधमरा यकीन हाथो में चिनगारियां ,फुलझड़ियों के नाम बारूदी बस्ती हुई ,सरहद है बदनाम मन इतना उजला नहीं ,जितनी रही कमीज देख समझ के बोलना ,सीखो कहीं तमीज अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस नेता आकर जीम लो,कंबल वाली घूस वेलेंटाइन प्रेम दिन ,कुछ तो है जी ख़ास डाल सको तो डाल दो ,मेरे को भी घास माधों किस मिटटी बने ,तुम हो मेरे यार नेता जड़े दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार

राधिका

जाने कब से ढूढता ,भूली गुमी किताब शायद मिल जाए दबा,सूखा हुआ गुलाब डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल किस मिटटी के ...(राधिका छंद,13-9) छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी रात सुबह-सुबह के कोहरे ,बर्फ दबी बात अगहन के दिन आलसी ,पूस नहीं काम अब अलाव में राख है ,आग नहीं राम महाकाय सी छवि बनी, व्यर्थ मगर नाम बातो की बस छूरियां, बगल रखे राम किस मिटटी के हो बने ,यार माधो बोल नेता जडे दुलत्तियाँ ,बन्द समझ खोल सुशील यादव एक शराफत आइना , समझ दिखा यार चल- फिर सके मरीज या,बेसुध-बीमार सुशील यादव aao

मायावी

मायावी जड़ खोदना,चढ़ना सीख पहाड़ वज्र सरीखे काम हैं ,जान दधीची हाड मन की हर अवहेलना,दूर करो जी टीस व्यवहारिकता जो बने ,ले लो हमसे फीस सुशील यादव तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास सुशील यादव साल नया स्वागत करो ,हो व्यापक दृष्टिकोण अंगूठा छीने फिर नहीं ,एकलव्य से द्रोण सुशील यादव ध्वनि की आहट में सहज,मारा करता तीर प्रतिमा केवल पूज के ,एकलव्य गंभीर सुशील यादव ,दुर्ग भारी जैसे हो गए,नये साल के पांव खाली सा लगने लगा,यही अनमना गांव सुशील यादव ना राहत की योजना ,ना विकास के पाँव जिसको पूछे वो कहे ,छुआ तरक्की गांव सुख के पत्तल चांट के ,गया पुराना साल दोना भर के आस दे , बदला लिया निकाल कलेंडर सब उतार दो ,गया पुराना साल नये साल की स्वागते,रंग नई दीवाल सुशील यादव तेरे पास अकल नहीं ,ले ले ज़रा उधार तुझसे रिश्ता यूँ लगे ,कोई कर्ज उधार पीसा की जमीन खड़ी, झुकती सी मीनार बीते साल यही कसक,हुए रहे भयभीत कोसो दूर हमसे रहे ,सपने औ मनमीत नवा साल उतरे मुड़ी ,जाबे काखर गांव | साधन तोर घटे हवे ,काला खात-बचांव || सुरतावत बनते बने,अइसन पाछू साल अतका खिलिस कमल इहां,गाले गाल गुलाल सुशील यादव दुर्ग जतका तोर उमर हवे, एकलव्य रूठा ना रहे ,अर्जुन से गुरु द्रोण अंगद के जैसा जमे,उखड़े कहीं न पाँव लूटे सौ-सौ गजनवी,उजड़ न पाए गाँव