Saturday, 24 September 2022
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मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
मेरे भीतर मर गया , पढ़ा लिखा इन्सान |
नेता जब से बाटते ,गली-गली में ज्ञान
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम
कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत
समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत
ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ या भाग
राजनीति की मिर्च अब ,लगा रही है आग
नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट
कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट
फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील
किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील
थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत
सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत
अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल
रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल
ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल
जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल
आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार
तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार
दीमक बन के खा गई ,दीमागी भूगोल
दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल
रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच
पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच
पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप
विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप
लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास
संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग
दूजे की ले ढपलियां,आप सुनाएँ राग
संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह
ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह
--
होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौंक
मन माफिक तो चर लिया,बिन बघार बिन छौंक
किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक
कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक
--
फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप
टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप
--
चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट
हैरत दे खैरियत,पूछे कभी न चोट
--
रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर
कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और
जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट
उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट
--
ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात
निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात
--
दुनिया समझती है नहीं,नहीं समझते आप
मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप
संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान
शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान
सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल
शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल
करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार
साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार
कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग
हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग
भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल
अपना सिक्का ढालने,बिठा रही टकसाल
हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय
झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय
उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान
दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान
खाने को मुहताज थे,अब है छप्पन भोग
नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग
इतने सीधे लोग भी ,बनते हैं लाचार
कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार
दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात
लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात
सरहद रखवाली लगे ,अपने वीर जवान
उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान
जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार
बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार
सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास
बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश
मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल
अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल
राहत जिसे ,ये वंचित से लोग
छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग
मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम
तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम
एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर
असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर
व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष
हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश
जिस दिन से बन्दी हुआ,साधू लिपटा भेष
इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष
पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद
बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद
जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार
जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार
आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीन
तेरे पन की महक से ,इतरा रही जमीन
लक्ष्य निशाने साधिए ,शीतल वचन समीर
हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर
सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर
तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर
हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन
मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन
पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार
वे तर्पण याचक नहीं ,सहज बात संस्कार
अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान
दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान
जिनकी संगति में पले , वैतरणी का ज्ञान
फुर्सत का तर्पण करें , यही पितर सम्मान
लिख के लाये लोग सब ,अपने-अपने लेख
तेरी कृपा रुकी हुई , दिल्ली जाकर देख
हर कोई क्यो मारता,बात-बात में लात
जुटा हुआ है आदमी ,कोल्हू के हालात
हर कोई है जनता,मेरे मन की बात
केवल तुझे पता नहीं ,कैसे बीती रात
कफस-कफस खाली मिले, पंछी हो आजाद
हर कोयल की कूक में,रहे न कुछ फरियाद
आओ हम मिल बांध दें ,अफवाहों के पैर।
दो गज दूर नहीं चले, बिन मकसद के बैर
एक करोना व्याधि से ,जग सारा भयभीत
शक की नजरें घूमती ,कण-कण में मनमीत
एक करोना से मचा,दुनिया मे कुहराम
मुझको अल्ला से शिफा, तुझे बचाए राम
जाने कैसा मच गया ,धकधक हाहाकर
तूफानों के बीच में ,किसका बेड़ा पार
देखे अपनों के यहाँ , बदले- बदले रंग
बेबस मन को तौलते ,दुविधा के पासंग ..
लोगों की पहचान में , हो जाती है देर
खुशकिस्मत अंधे यहां ,जिनके हाथ बटेर ..
मैं हूँ अपने आप से , इधर बहुत नाराज
सूरज सुख का ढल गया , नींद खुली लो आज ..
सुधियों के आंगन कभी ,रहती थी मुस्कान
हुआ यहींS मन लापता ,खोकर खुद पहचान ..
शायद मेरे मर्म तक ,पहुँच न पाते आप.
मेरे कद का इस लिए , लेते रहते नाप..
इस बहाव में क्या करें ,जल के भीतर मीन.
जाना था जापान तो ,पहुच रही है चीन..
संभव सा दिखता नहीं , रुके कहीं बहाव.
लौट चले लेकर हमी,अपनी टूटी नाव..
जब भी छूती ये नदी , खतरा क्रूर निशान.
बह जाता है साथ में,हाथो का सामान..
सावन का अंधा हुआ . हरे -हरे की सोच.
हरी-हरी के जाप में , भूलो कण्टक मोच..
सावन का अंधा हुआ ,सोच हरा चहुँ ओर.
बिगड़ी शायद यूँ बने ,जोर लगा कुछ और..
केवल इतना ध्यान रख , होय नहीं अभिमान.
तीर वहीं हो लक्ष्य में , मछली आँख निशान..
हरि अर्जुन को दे गए ,गीता में सन्देश.
रण में जो है सामने ,न बन्धु- सखा नरेश..
दुविधा के हर मोड़ पर ,देता था जो ज्ञान.
कृष्ण बना था सारथी , तज कर तेज महान..
लीला जिसकी देख के ,चकित विश्व सब ओर.
ऊँगली में पर्वत उठा , रोका बारिश जोर..
राजनीति में जो निपुण, किया अधर्म विरोध.
हम ऐसे प्रभु कृष्ण पर , करे सार्थक शोध..
बिगड़ी बात बनी नहीं , सावन बीता जाय.
मेरे संकट काल को , कौन दिशा बतलाय..
जरासंघ अपराध हो , या रिश्तों में कंश.
गर्व मीन को ले उड़े , काल- समय का हंस..
दिखता मुझको सामने , हर कोई नाराज.
जिसका बिगड़ा कल रहा ,कैसे सुधरे आज..
राम नाम की नाव थी ,खेने बाला ख़ास.
रामायण पहुचा गया , घर-घर तुलसीदास..
असमंजस मन्दोदरी,समझाती थी नेक
सन्धि -सुलह हो नाथ अब , दृढ़ता से जिद फ़ेंक
वानर -दल की वीरता ,आई हरदम काम
लंका जलती रह गई ,छूटी पकड़ लगाम
रंग अबीर गुलाल का ,सीखो शिष्टाचार
केवल उस पर डालना,जिस पर हो अधिकार
इस होली में तंज का ,करना नही प्रयोग
अपने -अपने हाल में,भड़के बैठे लोग
पल भर में ही ढह गये ,महलें आलीशान
नफरत की थी होलिका,आतंकी तूफान
उस घर मे भी झांक लो,जहां नहीं कुछ शेष
मरहम पट्टी प्यार दो ,छोड़ो नफरत द्वेष
जाने कैसे कर गया ,मुझ पर कौन प्रयोग
कॅरोना ग्रसित मैं हुई ,प्रेम व्यथित संयोग
बदला बदला सा लगे , मायावी व्यवहार
समतल नित मैदान में,व्यापक मचा प्रहार
दरवाजे सब बन्द हैं , ईश सभी नाराज
तू भी रख तैयारियां , गिरने को है गाज
जब तक आकर जायगा, एक बड़ा तूफान
हिल जाएगी नीव ही , जहां खड़ा इंसान
व्यापक अर्थ नसीब का , जान सका ना कोय
पछतावा आँसू बिना, कर्म अकारथ होय
खेल खेल में डूबना, कैसे होता यार
लोग चार फांसी चढ़े, जाने ये संसार
मन की सारी धारणा,हो जाती निर्मूल
जड़ें करोना बेधती,बन संकट के शूल
कोई भी ज्ञाता नहीं ,क्या उपाय अनुकूल
अंध भक्ति विश्वास ही,दें प्रभाव प्रतिकूल
बचना बारिश से तुझे ,अपनी छतरी तान
इस क्रोना बौछार में , केवल दूजे की मान
उड़ती पतंग खूब ये , देते जाना ढील
समझौतों की डोर कम, नभ में उड़ती चील
एक अकेला हो गया , भीड़ बीच इंसान
खींचे प्रभु ने हाथ अब ,निद्रा-मग्न भगवान
तेरा इलाज जानता , कितना वैद्य- हकीम
बस इतनी है खैरियत , मुश्किल के दिन तीन
सर पर इतना बोझ तो ,अक्सर सहता पेट
पर बचपन को काम में,चढ़ा रहे क्यो भेट
मन्दिर अब सूना हुआ ,मधुशाला में भीड़।
कोलाहल के बीच में, कोयल की है नीड़
मदिरालय में शोर है,मन्दिर है सुनसान
ये कलयुग की आस्था , युग का है अवसान
कठिन काम मेहनत से,करें श्रमिक सब लोग।
उस श्रम का हम आम जन, जान सकें उपयोग
श्रम की जननी पेट है ,इसका रखना ख्याल
करो कारखाने से तभी,पैदा इच्छित माल
रब से मांगू ये दुआ ,बस्ती हो खुशहाल।
सबकी लम्बी हो उमर ,जी लें सालों साल
जाने कितने शह मिले, कितनी खाई मात
बता गया कोविड हमे , पल भर मे औकात
कौन छीन कर ले गया, तेरा सब्र करार...
तारे दिन मे देखती,अजब हुआ संसार..
दुनिया पीछे है पड़ी,धोकर अपने हाथ
अब क्या और बिगाड़ती,आती वापस नाथ।
अपने-अपनो ने लिया ,मिल-जुल सब कुछ बाँट
एक करोना बच गया ,बन के टाई नॉट
पँछी नहीं है डाल में,पथिक नहीं है राह
रहबर भूखे मर रहे, राहजनी की चाह
राहजनी की चाह, लोग जाने-पहचाने
किसे भगाएं मार,घरों के सभी सयाने
जन-जन लापरवाह हैं, दौड़ पड़ेगी भीड़।
सोच-समझ के खोलना,नाजुक डाली नीड़
आज करोना त्राण से, करता हूं आगाह।
भूले से मत खोलना, बोतल जिन्न गुनाह
चला न जाये जब तलक ,दरवाजे से दूर
तुम भी कहां बजा सको,अमन-चैन सन्तूर
छोड़े हैं घर- बार हम ,छूटा सारा गांव।
जाने अब किस हाल में,मिले वापसी नाव
भविष्य तो अँधकारमय,क्या ठीक वर्तमान।
भूसे में तिनका गुमा,दोष किसे यजमान
बना दिया दिन आलसी,रातें हैं नाकाम
किसको रख लें काम पर,किससे मांगे काम
दुविधा में बेसुध हुए ,नहीं योग व्यायाम
अंग लगे खाना कहाँ,निष्फल चारो धाम
अपने मन की अब कहो, डूबा खड़ा जहाज
पी लें कुंआ खोद के,अब वो नहीं रिवाज
पँछी नहीं है डाल में,पथिक नहीं है राह
फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील
किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील
थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत
सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत
अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल
रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल
एमए- बिए का करौं,ओमे हे पिचकाट
अतका जबर हवे नहीं ,दद्दू हमर ललाट
करोड़ बारह सौ फूंके हैं ,बांटे मोबाइल सरकार
गंवार-अपढ़ जनता होवे,मोबाइल की क्या दरकार
जिन गावो में भूखा प्यासा,खेती करता दिखे किसान
मोबाइल उन हाथो देकर,तुम समझो खुद धन्य महान
नक्सलवादी वहीँ जमे हैं ,ले पैसा इस नाम अकूत
रोजाना ताबूत भेजे जाते ,भारत वीर जवान सपूत
किस मिटटी के तुम हो माधो ,ह्रदय तुम्हारा हाय कठोर
विपदा- संकट रखते साथी ,नेता- अफसर चिन्दी चोर
कौन योजना के बलबूते ,होगी अब की नैय्या पार
जनता और भरम में डालो ,कर लो फिर से छल व्यापार
विकास मुद्दे चुनाव गायब , कहो राज के तारणहार
मोबाइल दे के लूट रहे , सरकारी संचित भंडार
पढ़ने वाले बच्चो को देकर ,करते यहां गहन अपराध
भटकाने-दौड़ाने पथ में ,छोड़ दिए हो क्रोधित बाघ
जनमत को अब मत भटकाओ,देना होगा सभी हिसाब
बन्द करो ये दारू खाने, मुफ्त बांट चुनावी शराब
बारिश में अब भीगना ,होता है हर रोज
डूबी अपनी नाव कब ,किधर करें हम खोज
अपने-अपने दंभ को ,भूल-बिसर के आज
शामिल होली में रहो ,जुड़ता दिखे समाज
फागुन-फागुन सा हुआ ,सावन बिछुड़ा मीत
छोड़ अधर की बासुरी ,राधा विरहा गीत
कायरता की राह में ,हद से निकले पार
माया जननी मोह की,देख यही संसार
पद प्रतिष्ठा वो छोड़ के ,सड़कें नापे रोज
कीचड़-कीचड़ में खिले ,पंकज,कमल,सरोज
देख तुम्हारी सादगी , हाथो बचा गुलाल
जीवन सारा काट दे ,इतनी सोच मलाल
संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ
गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ
भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास
रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास
कल थे वे जो रूबरू ,जन सेवक बन बीच
आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच
रेखा कभी- कहाँ खिंची,परंपरा के खेल
देखो जला मशालची,जितनी-जी भर तेल
अवगुन पीछे छोड़ कर ,गुन की करे बखान
राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान
मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर
चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर
जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान
चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण
तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम
मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम
मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर
चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर
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