Saturday, 24 September 2022

हम आजाद हैं

दोहे सुशील यादव हम आजाद हैं , -- मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान । उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।। -- सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान । लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।। -- पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम । आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।। -- ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान । तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।। -- सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान -- सुशील यादव जाने कैसे लोग ये .... # खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन। हर करतूत मियाद पर,पाती सजा यकीन ।। ## जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार। बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।। ## आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल। भगआ-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।। ## जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज। वैभव सारा रह गया ,गिरी काल की गाज।। ## एक अधम से काम ने,औरो की ली जान। कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।। ## सुशील यादव कुछ दिन तो गुजारो .... --- सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार | चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार || ---- पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार | देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार || --- वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार| अभी-अभी तो लौट हम,देखे रंग हजार || --- पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार| मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार || --- मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार | दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार || --- सुशील यादव दुर्ग शहर मचा कुहराम... ## सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम। छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम ## सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार ## नुकसान-नफा देख मत,बाबाओं के संग ज्ञान गया है भाड़ में,नोट कमाय दबंग ## मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज ## सुशील यादव अफवाहों के पैर में .... सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन # अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील # अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान # मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक # हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर सुशील यादव ,दुर्ग बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल साफ सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल # बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन पानी- पानी ढूढते,नीचे पैर जमीन # मंदिर- द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम फिर थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम # गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार # जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग # प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन # मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम # कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार # फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार # मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत # बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल # कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून. लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून # समय यही माकूल है ,रह लो उस पासंग सोच समझ के तौलता ,भाई है बजरंग # आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान फिर से लंका जीत ले ,थका हुआ हनुमान # रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग # खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन कल जो तू सरताज था,खारिज आज यकीन # जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम # भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग # इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार नेताओ के रूप में ,निभा रहे किरदार सुशील यादव निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम इस माया संसार का,किसके पास लगाम --- निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम इस माया संसार का,किसके पास लगाम किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली हाथ इशारो पुलिस,उच्चके चोर मवाली ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला चोला है बैराग ,खरीदने जगत निकला सुशील यादव दुर्ग -- फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब -- जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार --- हैं खूनी छीटे पड़े ,पत्थर महज जनाब रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब --- जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर -- तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन दुश्वार --- हलके हमको ले रहे,होंगे भारी चीज समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज --- रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूँ तान पर ज्ञानी का गिर गया ,गर्व भरा अभिमान -- हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान सुशील यादव संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात जब ये आवें साथ में ,जगत हुआ बौरात इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम भीतर फिर से झांक लो ,कितना साबुत राम -- जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज लहरे ंभी करती कहाँ ,कितनी देर लिहाज सुशील यादव -- अपने मकसद डालता,देख परख के घास जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश कल की आहात द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश 2.8.17 किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश कल की आहात द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश सामयिक दोहे ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल -- आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार -- दीमक बन के खा गई ,दीमागी भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल *** भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन -- रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच सुशील यादव सामयिक दोहे 3 पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग अपनी ढपली बजा रहे ,खुद अपना राग सुशील यादव राखी के दोहे बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज विश्वास अडिग आपसी ,उत्तम दान-दहेज छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज सोने मांगू बालियां ,नही मोतिया हार भाई तेरा प्यार ही,जीवन भर उपहार सामयिक दोहे कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत ** ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ औ भाग राजनीति की मिर्च से ,लगती है जो आग ** नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट ** फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील ** थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत ** अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल सुशील यादव --- इस जीवन में आपको,मिले खुशी भंडार पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार -- मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत -- नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध -- अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध नफरत के माहौल यूँ ,ढूंढो प्रेम सुगंध -- सोते से अब जागिये ,होने को है देर नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर -- मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग जलते जलते बच गया ,आहत अमन सुहाग सुशील यादव विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम -- --- एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार --- वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर -- लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास ## कौन -कौन आ बैठते,माया रूप जहाज ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज ## बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच ## गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल ## सुशील यादव आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल कसैला अगर स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल ## सुशील यादव सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग ## सुशील यादव किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार --- रावण करता कल्पना, सोना भरे सुगन्ध पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूँ तान टिका नहीं उस ज्ञान का,गर्व भरा अभिमान सीढि स्वर्ग पहुचा सके ,किया रावण विचार आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग कुंडलियां 1 हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग पाखंड-पाप चांटते ,छप्पन- छप्पन भोग छप्पन-छप्पन भोग,रहे घी में उंगलियां बाहर कहीं बहार है,चार तरफ तितलियाँ हांफ रहे क्यों आज भी,देख मैदान वही खेलो खाओ लूट लो,लोग हैरान नहीं 2 गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे पापी-लोभी-दुष्ट,व्यभिचारी बात बनती गली कहाँ ये दाल,रोटी की किधर गिनती सुशील यादव 3 सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें जब निर्धन के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे मन्नत की उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी सुशील यादव 4 टेलीपेथी ... बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना प्रीतम मिलती सीख,संग दुख के जब जीना दिखे ऊंच ही नीच ,सभी सुख आधार बिना ## 5 आज ... कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज नियमो भरा समाज ,उलंघन से छुटकारा नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है मौन कहाँ कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ सुशील यादव 6 खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून सब लो भट्टी भून,गड़े मजहब का झंडा रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा गौरवशाली देश ,निरा तू कंगाल रहा वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहा सुशील यादव दुर्ग 7 हैरान कहीं देखकर ,बदल न पाए लोग पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग छप्पन- छप्पन भोग,ऊँगलिया पाँचो घी में आस्था की ये लाश ,बहा दो कहीं नदी में रहते बेबस लोग,दिखे ना मुस्कान कहीं करती है ये बात ,मुझे बस हैरान कहीं @@@ 8 रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे सुशील यादव ### ९ रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला इसीलिए केवल यही ,इशारों में कहता गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता सुशील यादव संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह सुशील यादव रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच सुशील यादव *** काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून सुशील यादव *** होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक जितना चरना चर लिया ,बिन बघार बिनछौंक सुशील यादव ** होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक मन माफिक तो चर लिया ,बिन बघार बिन छौंक **S किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक *** फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप सुशील यादव ** चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट हैरत देके खैरियत,पूछे कभी न चोट ० रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और % दीमक बन के खा रही ,दिमाग का भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल *** दीमक बन के खा रही ,दीमागी भूगोल दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल *** भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन सुशील यादव ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ औ भाग राजनीति की मिर्च से ,लगती है जो आग # कौन छुआ ऊंचा शिखर,कौन हुआ भयभीत समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत # नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट # फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील # थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत # अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल # जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट # छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज # ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात # सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार संकट में हो निकटता, दुःख के क्षण हो नेह ख़ुशी-ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक ये देह आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार आगे-आगे मैं झुकूं ,तेरे पालनहार # बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज पाकर भाई धन्य हूँ ,उत्तम दान-दहेज # इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास # चुनाव-रथ में बैठकर ,देने को सौगात निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात # अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव सौ बार लुटे गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव # अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत @@ कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप # भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग # अपने बस में अब नहीं ,बस में करना आज बिखरा है कुनबा सभी ,टूटा हुआ समाज # हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन किसी ड्राइंग रूम का ,बिगड़े ना कालीन # कितनी करके नेकियाँ ,दिए कुए में डाल अगर बचा हो आब तो,तू ही जरा निकाल # नोटबन्दी हुई वजह , हाथ जरा है तंग वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग # ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप ## मन की जैसी धारणा ,वैसा रख उत्साह एक जलन की आग से,घर-घर हुआ तबाह # हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन ड्राइंग रूम में रखा ,बिगड़े ना कालीन # बूढ़े बरगद ने पढा ,पोथी- ज्ञान किताब उल-जलूल तू ने लिखा ,पाता रहा खिताब # कितनी करके नेकियाँ ,दिए कुए में डाल अगर बचा हो आब तो,तू ही जरा निकाल # हुई नोटबन्दी वजह , हाथ जरा है तंग वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग # होली जैसी गालियां ,आम हई सब ओर कहो इसे हुड़दंग या ,कहो चुनावी शोर # लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत हर दुविधा के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत #

No comments:

Post a Comment