Saturday, 24 September 2022

राधिका

जाने कब से ढूढता ,भूली गुमी किताब शायद मिल जाए दबा,सूखा हुआ गुलाब डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल किस मिटटी के ...(राधिका छंद,13-9) छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी रात सुबह-सुबह के कोहरे ,बर्फ दबी बात अगहन के दिन आलसी ,पूस नहीं काम अब अलाव में राख है ,आग नहीं राम महाकाय सी छवि बनी, व्यर्थ मगर नाम बातो की बस छूरियां, बगल रखे राम किस मिटटी के हो बने ,यार माधो बोल नेता जडे दुलत्तियाँ ,बन्द समझ खोल सुशील यादव एक शराफत आइना , समझ दिखा यार चल- फिर सके मरीज या,बेसुध-बीमार सुशील यादव aao

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