Saturday, 24 September 2022

राधिका 2

एक शराफत आइना , समझ दिखा यार चल- फिर सके मरीज या,बेसुध-बीमार दुश्मन से मिलकर कभी, पूछ कुशल क्षेम सरहद में ललकार हो ,सही देश प्रेम बीत बरस सत्तर गए ,लाये हुए सुराज आओ अतीत झांक लें,बूढा दिखे समाज सब बत्तीसी झड़ गई ,अकड़ गई है भाग झुकी कमर लाचार सा,बूढा दिखे समाज गांधी ! मिल घर गोडसे ,पूछते कुशल क्षेम इसे नोट महिमा कहें ,या मानवता प्रेम ये तुम्हारे सोच की कौन सी फ़स्ल है ज़िंदा लाशें हर तरफ बेजान नस्ल है मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव अगर छलकता ज्ञान हो ,रखो उसे सम्हाल दुर्गति के आरंभ में ,करें जांच -पड़ताल बार-बार गलती वही ,दुहराते हो मित्र शायद दुविधा के कहीं ,उलटे पकडे चित्र मेरा 'पर' मत नोचना,बाकी बहुत उड़ान रहते हुए जमीन पर , नभ की चाह समान सुशील यादव इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार नेताओं के रूप में ,निभा रहे किरदार उम्मीद लगा बैठते ,गुठली के हों दाम सीख गए वे बेचना ,बात-बात में राम एक शराफत आइना ,ले के बैठे यार दुनिया रही कराहती ,तुम न कहो बीमार खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज साल नया है आ रहा,हो न विषम विकराल संयम उर्वर खेत में, बीज-व्यथा मत डाल तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूत आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर ऊपर ने बुन क्या दिया,उलझी सी तकदीर लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर करें प्रेम की याचना ,मिल जाए तो ठीक वरना दुखी जहान है ,आहिस्ता से छींक आये हैं अब लौट कर . हम अपने घर द्वार दुविधा सांकल खोल दो ,प्रभु केवल इस बार आये हैं अब लौट कर . हम अपने घर द्वार दुविधा सांकल खोल दो ,प्रभु केवल इस बार पांच बछर धर घुमत हन,आवेदन फरियाद बिना फसल डारन कती ,खातु करम के खाद टूटे मन के मोहरे ,चार तरफ से तंज कैसे दुखी बिसात पर ,खेले हम शतरंज बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल।। वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल।। संयम की मिलती नहीं,हमको कहीं जमीन लुटी-लुटी सी आस्था ,है अधमरा यकीन हाथो में चिनगारियां ,फुलझड़ियों के नाम बारूदी बस्ती हुई ,सरहद है बदनाम मन इतना उजला नहीं ,जितनी रही कमीज देख समझ के बोलना ,सीखो कहीं तमीज अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस नेता आकर जीम लो,कंबल वाली घूस वेलेंटाइन प्रेम दिन ,कुछ तो है जी ख़ास डाल सको तो डाल दो ,मेरे को भी घास माधों किस मिटटी बने ,तुम हो मेरे यार नेता जड़े दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार

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