Saturday, 24 September 2022

प्रभु

खुद को शायद तौलने,मिला तराजू एक समझबूझ की हद रहें, खोये नहीं विवेक आये हैं अब लौट कर . हम अपने घर द्वार दुविधा सांकल खोल दो ,प्रभु केवल इस बार खाने को मुहताज थे,अब है छप्पन भोग नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन भोग खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज ap भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल अपना सिक्का ढालने,बिठा लिए टकसाल तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल हाथो में चिनगारियां ,फुलझड़ियों के नाम बारूदी बस्ती हुई ,सरहद है बदनाम सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख काटों का मौसम कभी ,हो जाए अनुकूल वेलेंटाइन तुम भेजना ,मुझे pyaar फूल हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल अपनी चाहत तोड़ ले ,दिखे गुलाबी फूल

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