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दोहे
सुशील यादव के.......
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दीप उधर भी जल रहा ,थका-थका मायूस.....।
गन्ना सहित किसान को ,सरकार रही चूस…..।।
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मंदिर बनना राम का ,तय करते तारीख.....।
चतुरे-ज्ञानी लोग
क्यों,जड़ से खायें ईख…..।।
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इस सूरत का आदमी,पायें कभी-कभार.....।
बिना-गिने ही नोट
को,सौपे गंगा धार…..।।
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गुण को पीछे छोड़ कर ,अवगुन करे बखान.....। राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान…..।।
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