Thursday, 28 December 2017

दोहे सुशील यादव के.......  
दीप उधर भी जल रहा ,थका-थका मायूस.....।      
गन्ना सहित किसान को ,सरकार रही चूस…..।। 
मंदिर बनना राम का ,तय करते तारीख.....।       
 चतुरे-ज्ञानी लोग क्यों,जड़ से खायें ईख…..।। 
इस सूरत का आदमी,पायें कभी-कभार.....।           
 बिना-गिने ही नोट को,सौपे गंगा धार…..।। 
गुण को पीछे छोड़ कर ,अवगुन करे बखान.....।        राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान…..।। 

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