Thursday, 28 December 2017

मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव.....।               
बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव…..।। 
डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल.....।              
मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल…..।। 
पता नहीं ये रास्ता ,किधर -किधर को जाय.....।        
कोई कहे विकास पथ ,संसद  कभी   पठाय…..।। 
चाँद सतह पर हो गया ,बूढा मातादीन.....।                   बोतल दारु सब खतम,हाथो भी नमकीन…..।। 
बरय दिवाली के दिया,नइये कछु अंजोर.....।               करिया-करिया कस दिखे,टिकली-विकली तोर…..।। 
सुलगे-रमचे गोरसी,ओधा करे कपाट.....।                       
बेचे माल बनारसी ,बिना तराजू बाट…..।। 
विपदा कभी छुई नहीं,घिरे कभी न क्लेश.....।              
दूर हुए यशवंत तुम  ,यादें हैं अब शेष…..।। 
जब हो जाए रोकना ,मुश्किल से आवेग.....।              
साधू -सन्तों का हुआ ,विचलित मन उद्वेग…..।। 
पाये प्रभु हम आपसे ,कितने भी दुत्कार.....।              
हम आखिर में जानते,होना है उपकार…..।। 
लेकर मन की आस्था ,चढ़ा रहे हैं फूल.....।              
सदा यहीं  माथा लगे ,मिटटी-चन्दन धूल…..।। 
मन के भीतर बोलता ,साधु !साधु सा बोल.....।        
 पर बाहर आ पीटता ,अहंकार के ढोल…..।। 
बिना फसल डारन कती ,खातु करम के खाद.....।       
 पांच बछर धर घुमत हन,आवेदन फरियाद…..।। 
कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल.....।                  
 मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल…..।। 
गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार.....।                       
 कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार…..।। 
जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग.....।                  
  करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग…..।। 
प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन.....।               
मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन…..।। 
मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम.....।               
सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम…..।। 
फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार.....।             
बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार…..।। 
खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले  जमीन।      
 हर करतूत मियाद पर,पाती  सजा यकीन ।।
जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार।.                    
 बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।।
सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार.....।               बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार…..।। 
आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल।                   
भगआ-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।।
मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज.....।                 दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज…..।। 
जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज।            
वैभव सारा रह गया ,गिरी  काल की गाज।।
सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन.....।                 कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।।…..।। 
सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम।.           
छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम…..।। 
अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील.....।                 व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील…..।। 
अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान.....।                
मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान…..।। 
मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक.....।                          राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक…..।। 
हाथ लगी जब चाबियां ,निकले  नीयत खोर.....।        
बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर…..।। 
समय यही माकूल है ,रह लो उस पासंग.....।            
सोच समझ के तौलता ,भाई है  बजरंग…..।। 
रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग.....।                
कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग…..।। 
जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम.....।               
जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम…..।। 
भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग.....।                
भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग…..।। 
मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान ।.                     
उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।।…..।। 
सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान ।.                   लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।।
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम ।     
आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।।
ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान ।     
तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर  बदजुबान ।।
सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान.....।                      मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान…..।। 
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम.....।            
 इस माया संसार का,किसके पास लगाम…..।। 
लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब.....।              फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब…..।। 
हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार.....।              जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार…..।। 
काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन  दुश्वार.....।                 
तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार…..।। 
पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार.....।              
इस जीवन  में आपको,मिले खुशी भंडार…..।। 
अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध.....।          नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध…..।। 
जलते जलते बच गया ,आहत  अमन सुहाग.....।      
मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग…..।। 
प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम ....।            विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम…..।। 
एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार.....।                
 बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार…..।। 
वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर.....।                     भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर…..।। 
लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ.....।                       पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ…..।। 
सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार ।                  चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार ।। 
देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार।                      
पास हमारे  वोट हैं,करते तुम तकरार।। 
मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार ।          
दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार ।। 
किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर.....।    
कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और…..।। 
सीढि स्वर्ग पहुचा सके  ,किया रावण विचार.....।     
आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार…..।। 
मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास.....।      
 कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास…..।। 
कौन -कौन आ  बैठते,माया रूप जहाज.....।                 
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज…..।। 
बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच.....।                   
जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच…..।। 
हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम.....।                    मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम…..।। 
गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल.....।                  जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल…..।। 
आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल.....।               अगर कसैला स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल…..।। 
संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात.....।              
 जब ये आवें साथ में ,जगत  हुआ  बौरात…..।। 
अपने मकसद  डालता,देख परख के घास.....।               
 जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास…..।। 
इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक.....।                     किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक…..।। 
किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश.....।                
 कल की आहात द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश…..।। 
ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल.....।                        जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल…..।। 
आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार.....।            
तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार…..।। 
भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन.....।                    
मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन…..।। 
रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच.....।                  
पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच…..।। 
पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप.....।             विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप…..।। 
महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश.....।                लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास…..।। 
संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह.....।                ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह…..।। 
काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून.....।                        
 देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून…..।। 
होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक...।      
मन माफिक तो चर लिया ,बिन बघार बिन छौंक…..।। 
किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक.....।           
 कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे  रंक…..।। 
चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट.....।                   
 हैरत  देके  खैरियत,पूछे कभी न चोट…..।। 
रहने दो   हर बात को ,निजी आपसी तौर.....।          
 कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और…..।। 

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