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मंदिर बनना राम का ,आये याद चुनाव.....।
बस तत्परता से भरें ,हर माहौल तनाव…..।।
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डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल.....।
मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल…..।।
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पता नहीं ये रास्ता ,किधर -किधर को जाय.....।
कोई कहे विकास पथ ,संसद कभी
पठाय…..।।
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चाँद सतह पर हो गया ,बूढा मातादीन.....। बोतल दारु सब खतम,हाथो भी नमकीन…..।।
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बरय दिवाली के दिया,नइये कछु अंजोर.....। करिया-करिया कस दिखे,टिकली-विकली तोर…..।।
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सुलगे-रमचे गोरसी,ओधा करे कपाट.....।
बेचे माल बनारसी ,बिना तराजू बाट…..।।
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विपदा कभी छुई नहीं,घिरे कभी न क्लेश.....।
दूर हुए यशवंत तुम
,यादें हैं अब शेष…..।।
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जब हो जाए रोकना ,मुश्किल से आवेग.....।
साधू -सन्तों का हुआ ,विचलित मन उद्वेग…..।।
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पाये प्रभु हम आपसे ,कितने भी दुत्कार.....।
हम आखिर में जानते,होना है उपकार…..।।
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लेकर मन की आस्था ,चढ़ा रहे हैं फूल.....।
सदा यहीं
माथा लगे ,मिटटी-चन्दन धूल…..।।
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मन के भीतर बोलता ,साधु !साधु सा बोल.....।
पर बाहर आ पीटता ,अहंकार के ढोल…..।।
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बिना फसल डारन कती ,खातु करम के खाद.....।
पांच बछर धर घुमत
हन,आवेदन फरियाद…..।।
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कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल.....।
मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल…..।।
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गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार.....।
कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार…..।।
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जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग.....।
करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग…..।।
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प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन.....।
मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन…..।।
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मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम.....।
सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम…..।।
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फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार.....।
बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार…..।।
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खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन।
हर करतूत मियाद पर,पाती
सजा यकीन ।।
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जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार।.
बौने से कद में
दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।।
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सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार.....। बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार…..।।
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आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल।
भगआ-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।।
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मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज.....। दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज…..।।
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जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज।
वैभव सारा रह गया ,गिरी काल की गाज।।
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सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन.....। कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।।…..।।
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सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम।.
छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम…..।।
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अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील.....। व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील…..।।
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अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान.....।
मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान…..।।
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मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक.....। राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक…..।।
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हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर.....।
बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर…..।।
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समय यही माकूल है ,रह लो उस पासंग.....।
सोच समझ के तौलता ,भाई है बजरंग…..।।
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रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग.....।
कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग…..।।
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जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम.....।
जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम…..।।
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भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग.....।
भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग…..।।
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मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान ।.
उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।।…..।।
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सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान ।. लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।।
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पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम ।
आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।।
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ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान ।
तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।।
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सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान.....। मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान…..।।
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निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम.....।
इस माया संसार का,किसके पास लगाम…..।।
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लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब.....। फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब…..।।
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हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार.....। जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार…..।।
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काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन दुश्वार.....।
तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार…..।।
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पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार.....।
इस जीवन
में आपको,मिले खुशी भंडार…..।।
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अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध.....। नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध…..।।
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जलते जलते बच गया ,आहत अमन सुहाग.....।
मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग…..।।
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प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम ....। विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम…..।।
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एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार.....।
बदला मन में चोट
का ,रखना सदा उधार…..।।
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वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर.....। भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर…..।।
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लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ.....। पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ…..।।
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सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार । चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार ।।
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देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार।
पास हमारे
वोट हैं,करते तुम तकरार।।
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मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार ।
दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार ।।
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किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर.....।
कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और…..।।
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सीढि स्वर्ग पहुचा सके
,किया रावण विचार.....।
आड़ मगर आता गया ,खुद का ही
व्यभिचार…..।।
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मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास.....।
कुछ गौरव की बात
थी ,दिया किसी ने त्रास…..।।
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कौन -कौन आ
बैठते,माया रूप जहाज.....।
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज…..।।
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बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच.....।
जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच…..।।
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हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम.....। मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम…..।।
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गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल.....। जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल…..।।
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आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल.....। अगर कसैला स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल…..।।
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संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही
जात.....।
जब ये आवें साथ
में ,जगत हुआ बौरात…..।।
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अपने मकसद
डालता,देख परख के घास.....।
जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास…..।।
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इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक.....। किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक…..।।
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किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश.....।
कल की आहात
द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश…..।।
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ओढ़ पहन के बैठिये,नैतिकता की खाल.....। जनता केवल है खड़ी,चौराहे बे-हाल…..।।
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आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार.....।
तेरे -आगे मैं झुकूं ,मेरे पालनहार…..।।
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भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन.....।
मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन…..।।
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रहने हो हर बात को ,सदा आपसी-बीच.....।
पाप घड़ा जिस दिन भरे,दोनों हाथ उलीच…..।।
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पानी-पानी सब तरफ ,चित्र खींच लो आप.....। विपदा के माहौल में ,चारो ओर विलाप…..।।
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महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश.....। लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास…..।।
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संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह.....। ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह…..।।
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काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून.....।
देख बिहार यही
लगे ,अदभुत है कानून…..।।
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होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक...।
मन माफिक तो चर लिया ,बिन बघार बिन छौंक…..।।
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किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक.....।
कौन बना राजा उधर
,कौन यहां पे
रंक…..।।
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चुनती है जनता जिसे,देकर भारी वोट.....।
हैरत
देके खैरियत,पूछे कभी न चोट…..।।
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रहने दो
हर बात को ,निजी आपसी तौर.....।
कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और…..।।
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Thursday, 28 December 2017
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