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मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है
राम.....।
फिर थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम…..।।
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उम्मीद लगा बैठते ,गुठली के हों दाम.....।
सीख गए वे बेचना ,बात-बात में राम…..।।
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नींद भरी थी आँख में ,खुली रही लंगोट.....।
कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट…..।।
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इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम..... ।
भीतर फिर से झांक लो , साबुत कितने राम…..।।
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जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज.....
लहरें भी करती
कहाँ ,कितनी देर लिहाज…..।।
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आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान।.....।
फिर से लंका जीत ले ,थका हुआ हनुमान।।…..।।
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संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक
निदान.....।
भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान…..।।
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होना -जाना कुछ नहीं ,बस कर अपनी भौक.....।
जितना चरना चर
लिया ,बिन बघार बिन छौंक…..।।
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आशा का दीपक जला,तम में हुआ अधीर.....।
शांत रहो उजला दिखे,हिंदी की तस्वीर…..।।
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बदला चरित्र आपका ,रचते-रचते स्वांग.....।
जिधर कुआ-पानी
नहीं,उधर घोलते भांग…..।।
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मंदिर धजा उतार के ,पहिने हैं लँगोट.....।
प्रभू नाम की जाप के ,पीछे कितने खोट…..।।
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उम्मीदों के दौर में ,तुम भी पालो ख़्वाब.....। कैशलेस हो खोपड़ी,'बाबा छाप'खिजाब…..।।
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हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग.....।
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग…..।।
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दीमक बन के खा रही ,दीमागी भूगोल.....।
दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अब भी गोल…..।।
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पंछी बैठे छाँव में,उतरा दिखे गुरूर.....।
आसमान ऊंचाइयां,कतरे पँखो दूर…..।।
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थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत.....।
सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत…..।।
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चतुरे कुछ तो लोग हैं ,संयम अपरंपार.....।
बिना नोट के खींच लें,मायावी संसार…..।।
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संसद में इस बात पर, है मचा घमासान.....।
नोट नाम का काग ही, ले उड़ भागा कान…..।।
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व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष.....।
हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश…..।।
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बेटे से पद छीनता,कितना बाप कठोर.....।
यौवन ययाति सा मिले,बात यही पुरजोर…..।।
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हलके हमको ले रहे,होंगे भारी चीज.....।
समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज…..।।
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माया कलयुग में जहां ,दिखे नोट की छाप.....।
सार दौलत बटोर के
,हुए वियोगी आप…..।।
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खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून.....।
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून…..।।
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फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप.....।
टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप…..।।
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ज्ञान गणित के फेल हैं ,फेल जोड़ औ भाग..... । राजनीति की मिर्च से ,लगती है जो आग…..।।
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फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील.....।
किसको सूझे देखना
,पैरों कांटे कील…..।।
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अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल.....।
रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल…..।।
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सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास ..।
बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश ।।
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मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल.....।
अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल…..।।
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राहत जिसे मिला नहीं ,ये वंचित से लोग ....।
छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग .।।
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मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम ....।
तन के खातिर नाम
पर ,माया मिली न राम ।।….
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एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर ।. असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर ।।…
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छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात.....।
शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात…..।।
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सोते से अब जागिये ,होने को है देर.....।
नफरत के बारूद का ,बिछा हुआ है ढेर…..।।
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खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज.....।
ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज…..।।
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महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न काम.....।
बातो की बस छूरियां,संकट रहता राम…..।।
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Thursday, 28 December 2017
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