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मजहब मेरे मुल्क का,ऐसा कुछ हो जाय.....।
जब -जब भूखा मैं रहूं,तू खाए पछताय…..।।
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क्यों बेमतलब पीटते ,फटे-फटे से ढोल.....।
नाहक छोडो राम को ,केदार बबम बोल…..।।
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दुनिया तो समझी नहीं,नहीं समझते आप.....।
मुझे अगर है जानना ,मेरे कद को नाप…..।।
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तेरस के हो तोहफे ,खुशियां मिले अपार.....।
विनती करें कुबेर
से ,भरा रहे भंडार…..।।
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पहन मुखौटा बैठना ,करना बस आराम.....।
आप लगे है छीनने ,तुलसी से सिय-राम…..।।
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गांधी ! मिल घर गोडसे ,पूछते कुशल क्षेम.....।
इसे नोट महिमा कहें ,या मानवता प्रेम…..।।
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चौथ-चाँद करवा अभी ,छलनी ओट निहार.....।
साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार…..।।
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बन्द किया जो आपने ,ढक्कन वो तो खोल.....।
राम- रसायन स्वाद को ,चख लें सब बेमोल…..।।
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रथ चुनाव का है खड़ा ,चलकर तू भी बैठ.....।
नखरा भारी आड़ में ,मतदाता की ऐंठ…..।।
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रावण हरदम सोचता,सीढ़ि स्वर्ग दूं तान ...।
पर ग्यानी का गिर
गया ,गर्व भरा अभिमान…..।।
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सदा लक्ष्य पर छोड़िये,निज भाषा का तीर ....।
तब जाकर बदले
कहीं,हिंदी की तस्वीर ।।…..।।
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रावण बाहर ये खड़ा ,भीतर बैठा एक.....।
किस-किस को अब मारिये, सह-सह के अतिरेक…..।।
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एक शराफत आइना ,ले के बैठा यार.....।
दुनिया रही कराहती ,कहो न तुम बीमार…..।।
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लक्ष्य निशाने साधिए ,शीतल वचन समीर..... ।
हिंदी का होगा
भला ,बदलेगी तस्वीर…..।।
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कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप.....।
फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप…..।।
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हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन.....।
किसी ड्राइंग रूम
का ,बिगड़े ना कालीन…..।।
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नोटबन्दी हुई वजह , हाथ जरा है तंग.....।
वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग…..।।
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होली जैसी गालियां ,आम हुआ सब ओर.....।
कहो इसे हुड़दंग या ,कहीं चुनावी शोर…..।।
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लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत.....।
हर व्यथा के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत…..।।
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फागुन में क्यों साँवरे ,मन आकुल हो जाय.....।
बिना कहे सब जानती ,सखी नेह लिपटाय…..।।
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मन की जैसी धारणा ,वैसा ही उत्साह.....।
जलन की चिंगारी लगी ,वो घर हुआ तबाह…..।।
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अपने बस में अब नहीं ,बस में करना आज.....।
बिखरा है कुनबा
सभी ,टूटा हुआ समाज…..।।
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बूढ़े बरगद ने पढा ,पोथी- ज्ञान किताब.....।
एक सड़क की चाह में ,तुमने किया हिसाब…..।।
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कितनी करके नेकियाँ ,दिए कुए में डाल.....।
अगर बचा हो आब तो,तू ही जरा निकाल…..।।
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बैरागी मन गा रहा ,विरहा व्याकुल गीत.....।
जाने अब किस हाल में,तुम हो मेरे मीत…..।।
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कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग.....।
तब जाना कहते किसे,जीवन भर का रोग…..।।
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चलना दूभर है कहीं,थके हुए हैं पांव.....।
हांडी तेरी काठ की,करे अधमरा गांव…..।।
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तेरा होना इत्र सा ,देता था अहसास.....।
तेरे बगैर यूँ लगे,चला गया मधुमास…..।।
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जर्जर कितने हो गए ,मजबूती आधार.....।
जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार…..।।
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रावण करता कल्पना ,सोना भरे सुगन्ध ....।
पर कोई सत कर्म सा,किया न एक प्रबन्ध…..।।
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कौन छुआ बुलन्द शिखर,कौन हुआ भयभीत.....। समय-समय की बात है ,समय-समय की प्रीत…..।।
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दुविधा में दिखने लगे ,दिव्य जहां प्रकाश.....। समझो मिले उसी जगह , बाबा घासीदास…..।।
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Thursday, 28 December 2017
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