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जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट.....।
उस जनता की
खैरियत,पूछे कभी न चोट…..।।
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छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज.....। भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज…..।।
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ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात.....।
निकले
कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात…..।।
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सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार.....। साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार…..।।
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बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज.....। पाकर भाई
धन्य हूँ ,उत्तम दान-दहेज…..।।
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इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास.....। आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास…..।।
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अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत.....।
यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत…..।।
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भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग.....।
सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग…..।।
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ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप.....। फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप…..।।
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भूख गरीबी झेलती . जनता है
बेहाल.....। अपना सिक्का ढालने,बिठा रही टकसाल…..।।
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उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान.....।
दूर इलाके जा
कहीं,चिंतन तम्बू तान…..।।
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इतने सीधे लोग भी
,बनते हैं लाचार.....।
कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार…..।।
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दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात.....।
लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात…..।।
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सरहद रखवाली लगे ,अपने वीर जवान.....।
उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान…..।।
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जिस दिन से बन्दी
हुआ,साधू लिपटा भेष.....।
इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष…..।।
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आखिर में बन्दी हुआ ,साधू लिपटा भेष.....। अत्याचारी ज्ञात हो ,अवगुण रहे न शेष…..।।
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पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद.....। बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद…..।।
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संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ.....। गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ…..।।
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भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास.....। रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास…..।।
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कल थे वे
जो रूबरू ,जन सेवक बन
बीच.....।
आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच…..।।
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रेखा कभी कहाँ खिंची,परंपरा के खेल.....।
हरदम जला मशालची,देखत तेली
तेल…..।।
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मुन्नी बनकर आज जो ,गली-गली बदनाम.....।
टूटा पत्ता डाल का ,कल आवे किस काम…..।।
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चलता रहा चुनाव में,भेट-व्यवहार दाम.....। आज अचानक रोक के,खीचन लगे लगाम…..।।
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आज आदरणीय परम,रूठ गए हैं आप.....। लायक सपूत से कभी ,रूठा करता बाप बाप…..।।
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आहत मन से देखते ,कुछ अनबन कुछ मेल.....। सायकल की मान घटी ,पटरी उत्तरी रेल…..।।
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बेटा करता बाप से ,इतनी फकत गुहार.....।
दिलवा दो अब सायकिल ,पंचर दियो सुधार…..।।
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लिखने वाले लिख रहे ,तरह तरह आलेख.....। सबके अपने मन-गणित,अलग-अलग उल्लेख…..।।
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विकसित होते राज में,है विकास की गूंज.....।
एक दूजे टांग पकड़,तंदूरी में भूंज…..।।
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कितनी है संभावना ,फैला देखो पाँव.....। सीमित होती आय की,चादर जिधर बिछाव…..।।
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हरि को भज या,हाथ मल ,हो आ चारो धाम.....। बिना नोट के साल भर ,घोडा बिना लगाम…..।।
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पन्ने बिखरे अतीत के ,सिमटा देखा नाम.....। बैठी रहती तू
सहज ,पलक काठ गोदाम…..।।
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हमको तुमसा आदमी,मिलता कभी-कभार.....। बिना जान पहिचान के ,देता नोट उधार…..।।
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शक्कर मिले न नोट बिन,जानो गुड़ का स्वाद.....|
बिना हवन बटने लगा , सरकारी परसाद…..।।
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जिसको हम समझा किये ,मन के बहुत करीब.....। आखिर मे बन वो गया ,आडे प्यार रकीब…..।।
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मन भौरा मंडरा रहा ,तुझे समझ के फूल.....।
यही अक्ल
की खामियां ,बचपन मानो भूल…..।।
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मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम मे बौर..... ।
बिन तुझसे मिल भेंट के ,हलक न उतरे कौर…..।।
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नोट-शहद क्या चांटना,चिल्हर गुड़ का स्वाद.....।
बैंकों से
बटने लगा, सरकारी परसाद…..।।
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कर्तव्य न जाने तनिक ,जो मागे अधिकार.....। रुइया कानो डाल के, बैठी है सरकार…..।।
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हरि को भज या हाथ
मल ,हो आ चारो धाम.....।
बिना नोट के साल
भर ,घोडा बिना लगाम…..।।
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बन मे सूखी लकडियाँ ,घर मे सुलगे देह.....।
धुंआ- धुआ होता
रहे ,मन उपजा संदेह…..।।
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मौन जुलाहा कह गया ,ले धागा औ सूत.....।
ताने से तन ढांक ले ,बाने से मन भूत…..।।
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साई कभी करो जतन ,दे दो राख भभूत.....।
पीढी को जो तार दे ,अकेला हो सपूत…..।।
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लकड़ी मे जस घुन लगे ,लोहे मे तस जंग.....।
यश -अपयश सब साथ है ,भले-बुरे के संग…..।।
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तू भी बन के देख ले ,पंडित ,पीर फकीर.....।
राम -रहीम दुआर मे ,कौन गरीब -अमीर…..।।
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नफरत के इस कुम्भ मे ,खोज प्रेम लेवाल.....। जिसके भीतर 'मै' घुसा ,उतरे तो वह खाल…..।।
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गली-गली मे जीत का ,सिक्का तभी उछाल.....।
हो खजांची बाप
अगर ,घर मे हो टकसाल…..।।
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मत माथा अब पीट तू,कर मत तनिक मलाल.....। उपर वाला देख रहा,छप्पर है किस हाल…..।।
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अंग-अंग है
टूटता,छलनी हुआ शरीर.....।
कब छोड़ोग बोलना,अपना है कश्मीर…..।।
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जिस झंडे की साख हो,अहम सितारा-चाँद.....। आखिर वही झुका-झुका ,शरीफजादा मांद…..।।
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परिचय अपना जान लो ,पाकिस्तानी लोग.....। बीमारी उपचार भी ,जान-लेवा हम रोग…..।।
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सठियाये हो पाक जी ,बोलो करें इलाज.....। आतंक की गोद उतर ,चल घुटने बल आज…..।।
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बेहद सुशील बोलता ,सीमा-सरहद छोड़.....। मन भीतर कइ घाटियाँ ,जगह-जगह हैं मोड़…..।।
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सत्तर बरस ओढ़-पहिन ,चिथरागे जी कोट.....।
प्रभू नाम तो जापते ,मन में कतको खोट…..।।
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साल-नवा, उतरे मुडी, बइठे हवस
सियान.....। कांदी-बदरा तै लुअस,बइहा ले गे धान…..।।
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खेत ज्ञान रोपा लगा ,लूबे अब्बड़ धान.....। राचर ब्यारा ज्ञान के ,लगाय रखव मितान…..।।
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तोर भरोसा जागही ,हमर देश के शान.....।
खोच बीड़ी अधजरहा,किंजरय मगन किसान…..।।
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समझ हमे चट्टान सा ,नजर लिए हो फेर.....। प्रेम बरसाय देख लो ,हम माटी के ढेर…..।।
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मौन पीठ में लादकर ,चलता है ये कौन.....। जंगल सारा जल गया,बचा-खुचा सागौन…..।।
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लौटेगा कब मालया ,गर्म रखो तन्दूर.....।
मारो डंडे पाँव में , उतरे सभी गुरूर…..।।
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मेरे माथे जड गया ,मुझसे जुडा सवाल.....।
Sले हाथो मे उस्तरा ,बजा गया वो गाल…..।।
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Thursday, 28 December 2017
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