राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत.....।
मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत…..।।
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मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग.....।
तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग…..।।
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संयम की मिलती नहीं,हमको कहीं जमीन.....।
लुटी-लुटी सी आस्था ,है अधमरा यकीन…..।।
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माधों किस मिटटी बने ,तुम हो मेरे यार..... ।
नेता जड़े दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार…..।।
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अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस.....।
नेता आकर जीम लो,कंबल वाली घूस…..।।
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चलती चक्की देख कर ,रोया दास कबीर.....।
माया छलनी नोट भी ,कहे अपना फकीर…..।।
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कोई भी अब सामने ,नहीं चुनौती शेष.....।
लंका पूरी ढह गई ,बचा नहीं लंकेश…..।।
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कौन किया है बोल ना ,पानी तेरा खून.....।
मिटा-मिटा जज्बात है ,लुटा-लुटा जूनून…..।।
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आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत.....।
तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूत…..।।
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देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर.....।
ऊपर ने बुन क्या दिया,उलझी सी तकदीर…..।।
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लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर.....।
खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर…..।।
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नीयत नेक किया करो ,अपने सारे काम.....।
बाबा घासीदास का ,इतना ही पैगाम…..।।
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पार लगाने अब कहाँ ,आए घासीदास.....।
मन का वही जगा अलख ,जग में भर विश्वास…..।।
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हाथो में चिनगारियां ,फुलझड़ियों के नाम.....। बारूदी बस्ती हुई ,सरहद है बदनाम…..।।
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संभव सा दिखता नहीं,हो जाना आसान.....।
शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना
ज्ञान…..।।
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जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और.....।
मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर…..।।
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सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल.....।
शंका हमको खा रही ,बिसरा सके न मूल…..।।
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साल नया है आ रहा,हो न विषम विकराल.....।
संयम उर्वर खेत में, बीज-व्यथा मत डाल…..।।
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की थी हमने नेकियां,नोट कुएं में डाल.....।
उस नेकी की फाइलें ,पुलिस रही खंगाल…..।।
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सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग.....।
कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग…..।।
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अच्छे-अच्छे दिन गए ,संग चने के भाड़.....।
बिन बरसे तुम भी चलो ,सावन और अषाढ़…..।।
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हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय.....। झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय…..।।
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मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर.....।
चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर…..।।
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जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान.....।
चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण…..।।
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तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम.....।
मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम…..।।
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मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर.....।
चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर…..।।
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आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर.....।
तब -तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर…..।।
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कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार.....।
जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार…..।।
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कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे
बवाल.....।
एक निशानी प्यार की ,रखो जरा सम्हाल…..।।
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चल विकास की बात कर, तुझको रोके कौन.....।
नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन…..।।
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खाने को मुहताज वे ,परसे छप्पन भोग.....।
शंका उनको खा रही ,थे जो भूखे लोग…..।।
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शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख.....। सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख…..|।
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दंगल दिखा कमा गए ,भारी भरकम नोट.....।
प्रभु हमारे दिमाग वो ,फिट कर दो लँगोट…..।।
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हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन ।.....
मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।।
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पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार .....।
कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।।…
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अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान ।. दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।।
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जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास ।
फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस।।…
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फूटे करम बिहार के,साथ नहीं कंदील.....।
जो अन्धेरा देख ले ,पैरों कांटे कील…..।।
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दुनिया तो समझी नहीं,नहीं समझते आप.....।
मुझे अगर है जानना ,मेरे कद को नाप…..।।
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मन इतना उजला नहीं ,जितनी रही कमीज.....।
देख समझ के बोलना ,सीखो कहीं तमीज…..।।
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इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार.....। नेताओं के रूप में ,निभा रहे किरदार…..।।
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बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल ।
वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल।।
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अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव.....।
सौ बार लुटे
गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव…..।।
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बच्चा तडफा भूख से ,मातायें बेहाल.....।
साफ सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल…..।।
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कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल.....।
हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल…..।।
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नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद.....।
तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद…..।।
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संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल.....।
कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल…..।।
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माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक.....।
राजा कभी न बन सका ,मन से रहता रंक…..।।
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जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम.....।
कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम…..।।
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सब बत्तीसी झड़ गई ,अकड़ गई है भाग.....।
खुले बदन इस पूस में,कैसे आवे आग…..।।
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नोट बन्दी नियम तहत,लाया चार हजार.....।
दो दारु की भेट चढ़ा,गया दो जुआ हार…..।।
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हैं खूनी छीटे पड़े ,पत्थर महज जनाब.....।
रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब…..।।
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सत्तर बीते साल तब ,आया हमको होश..... ।
कैसे मूक बधिर रहे ,बैठे थे खामोश…..।।
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खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर.....।
जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर…..।।
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अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द.....। राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द…..।।
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किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल.....। लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिम काल…..।।
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हम भी नहा-निचोड़ के ,बैठे हुए शरीर.....। दिमाग लेकिन
देखता , अधनंगी तस्वीर…..।।
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एक शराफत आइना , समझ दिखा यार.....।
चल- फिर सके मरीज या,बेसुध-बीमार…..।।
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कॉलर नही कमीज में,पेंट नही जेब.....। नँगा होने तक रचो,नया नित फरेब…..।।
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तुलसी घिस चन्दन तिलक,निर्णय रघुबीर.....।
राम -राज दिन वो फिरें ,बिना नोक
तीर…..।।
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जिस भाषा जो बोलता ,करो तुम दहाड़.....। हिम्मत से अब काम लो ,ताकते जुगाड़…..।।
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निर्णय को अब बाँट दो,जहाँ दिखे अतिरेक.....।
बीच अधीर धीरज तुम ,चुनना कोई एक…..।।
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Thursday, 28 December 2017
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