Saturday, 24 September 2022
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हम आजाद हैं
प्रभु
राधिका 2
राधिका
मायावी
सादगी
समय मिले तो
फलदार दोहे
दोहे 25.9.22
Friday, 16 September 2022
1
बेटे से पद छीनता,कितना बाप कठोर I यौवन ययाति सा मिले,बात यही पुरजोर II
2
पिता पुत्र से बोलता ,देखो वीर सपूत I सायकल तुझे सौप दूँ ,और निकाल सबूत II
3
सब की है ढपली यहाँ ,सबके अपने राग I ढोल-नगाड़े पीटना ,सुर जाए जब जाग II
महसूस नहीं हो हमे ,कतरो ऐसे पंख I महा-समर आरंभ हो ,बज जाए फिर शंख II
4
फिर चुनाव आना हुआ,निकले वन से राम I हर बगल है छुरी दबी,रखो काम से काम II
5
मानवता की आड़ में,दानव रहा दहाड़ I आशंकाओं का कहीं, गिरे न मित्र पहाड़ II
6
आज आदरणीय परम,रूठ गए हैं आप I लायक अपने पूत से ,रूठा करता बाप II
7
आहत मन से देखते ,कुछ अनबन कुछ मेल I सायकल की अब मान घटी ,पटरी उतरी रेल II
8
बेटा करता बाप से ,विनती और गुहार I दिलवा दो अब सायकिल ,पंचर दियो सुधार II
9
लिखने वाले लिख रहे ,तरह तरह आलेख I सबके अपने मन-गणित,अलग-अलग उल्लेख II
10
विकसित होते राज में,है विकास की गूंज I एक दूजे टांग पकड़,तंदूर वहीं भूंज II
11
कॉलर नही कमीज में,पेंट नही है जेब I नँगा होने तक रचो,कोई नया फरेब II
12
उम्मीदों के दौर में ,तुम भी पालो ख़्वाब I कैशलेस हो खोपड़ी,'बाबा छाप'खिजाब II
13
पंछी बैठे छाँव में,उतरा दिखे गुरूर I आसमान ऊंचाइयां,कतरे पँखो दूर II
14
साल नया है आ रहा,हो न विषम विकराल I संयम उर्वर खेत में, बीज-व्यथा मत डाल II
15
घटते-घटते घट गया ,पानी भरा तलाब I तनिक ओस की चाह में ,चाटो अपने ख्वाब II
16
माया कलयुग में जहां ,दिखे नोट की छाप I सार दौलत बटोर के ,हुए वियोगी आप II
17
इस सूरत का आदमी,पायें कभी-कभार I बिना-गिने ही नोट को,सौपे गंगा धार II
18
दंगल दिखा कमा गए ,भारी भरकम नोट I प्रभु हमारे दिमाग वो ,फिट कर दो लँगोट II
19
नोट-काले जेब रखे ,उजली बहुत कमीज I तू भी राजा सीख ले ,धनवान की तमीज II
20
कितनी है संभावना ,फैला देखो पाँव I सीमित होती आय की,चादर जिधर बिछाव II
21
अंग-अंग सारा टूटता,छलनी हुआ शरीर I कब छोड़ोगे बोलना ,अपना है कश्मीर ... II
22
तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूत I आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत... II
23
देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर I ऊपर ने बुन क्या दिया,उलझी सी तकदीर II
24
लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर I खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर II
25
मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर I चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर II
26
जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान I चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण II
27
तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम I मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम II
28
मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर I चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर II
29
आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर I तब-तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर II
30
तिनका-तिनका तोड़ के ,रख देता है आज I है कहीं अकड की बस्ती ,फिजूल कहीं समाज II
31
परिभाषा देशहित की ,पूछा करता कौन I बहुत खरा एक बोलता ,दूजा रहता मौन II
32
भव-सागर की सोचते ,करने अब की पार I गए निकल चुकाने तभी ,गिन-गिन कर्ज-उधार II
33
गया उधर एक मालया ,हथिया के सब माल I किये हिफाजत लोग वे ,नेता, चोर, चंडाल II
34
कभी देश की देख गति ,है कितनी विकराल I यथा शीघ्र अब जीम के ,खाली कर पंडाल II
35
मुह क्यों अब है फाड़ता ,कमर तोड़ है दाम I किसको कहते आदमी ,चुसा हुआ है आम II
36
मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर I चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन , ज्ञान-अबीर II
37
जिससे भी जैसे बने, ले झोली भर ज्ञान I आलोकित जग जो करे ,मगज रखा सामान II
38
एक जुलाहा हुआ चकित ,देख सूत कपास I तन से ताना क्या बुने,मन बाना विश्वास II
39
हम जिसको समझा किये ,अपने बहुत करीबI वो ही आखिर बन गया , आड़े प्यार रकीब II
40
मन भंवरा मंडरा रहा , तुझे समझ के फूल I यही अक्ल की खामियां ,बचपन मानो भूल II
41
मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम में बौर I बिन तुझसे मिल-भेंट के ,हलक न उतरे कौर II
42
तप किस तपसी ने किया ,मल के राख भभूतI आत्मचिंतन सुई पकड़,ज्ञानी डाले सूत II
43
देख जुलाहा हाथ की , तिरछी-खड़ी लकीर I ऊपर से बुन क्या दिया,विरासत कि तकदीर II
44
लोह ताप से भूलता ,अपनी खुद तासीर I खुद बिरादरी से पिटे,कभी न बोले पीर II
45
नफरत के इस कुम्भ में,खोज प्रेम लेवाल I जिसके भीतर 'मै' घुसा,उतरे तो वह खाल II
46
जड़ गया वो माथे में ,मुझसे जुडा सवाल I ले हाथो में उस्तरा , बजा गया जो गाल II
47
गली-गली में जीत का, सिक्का तभी उछाल I अगर खजांची बाप हो ,घर में हो टकसाल II
48
माथे को क्यों पीटना ,होता किसे मलाल I देने वाला देखता ,है छप्पर किस हाल II
49
दिन-रात कौन पूछता ,एक सरीखा सवाल I ले हाथो में उस्तरा , बजा रहे क्यूँ गाल II
50
लिखिए कुछ ऐसा मनुज,सज उठे वर्तमान I हो टक्कर की लेखनी ,रख आत्मसम्मान II
51
कोलाहल हो 'जग' अगर,बनो शान्ति के दूत I ले चरखा फिर हाथ में ,सुख के कातो सूत II
52
वाणी में अमृत घुले, रहे मधुर आवाज I परिपाटी हो स्थापना , जिसको कहें रिवाज II
53
तुमसे क्या-क्या मांगता ,व्याकुल आज समाजI स्वर्ण नोक बना कलम ,पहना दो फिर ताज II
54
स्वारथ सभी छोड़ दो ,त्याग दो अहंकार I परमार्थ में जी लगा ,जानो तुम संसार II
55
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय I आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय II
56
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून I फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी भून II
57
जाने कब से ढूढता ,भूली गुमी किताब I शायद मिल जाए दबा,सूखा हुआ गुलाब II
58
डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल I मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल II
59
लापता कहीं हो गई , पुत्र-मोह ललटेन I मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन II
60
ओढ़ पहन के बैठना, नैतिकता की खाल I जनता केवल है खड़ी,चौरहे बेहाल II
61
फूटे करम बिहार के,साथ नहीं कंदील I जो अन्धेरा देखती ,पैरों कांटे कील II
62
संकट में हो निकटता,रखना दुःख क्षण नेह I ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह II
63
कितना लगता है बुरा ,गिनती के दिन चारI इभन-आड के फेर में ,ताक रहे इतवार II
64
डोर न ढीला छोड़ना ,प्रीत पतंग उडाय I बिन मागे कुछ तो मिले,मांग के कछु न पाय II
65
उलझे मन की बात ये ,कभी न सुलझी डोर I रात करवटें ले कटी ,झपकी आती भोर II
66
जनता की दरबार है ,जनादेश सब होय I राज-रंक पल में करे ,आप न समझे कोय II
67
मोदी तेरे राज में ,दीन -दुखी हैं लोग I अच्छे दिन बुखार चढ़य,बुरे दिनो के रोग II
68
व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष I हाथ दुशाशन से बचे,रजस्वला के केश II
69
जिस दिन से बन्दी हुआ,साधू लिपटा भेष I इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष II
70
पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद I बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद II
71
जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार I जो तुमको धोखा लगे,वही हमारा प्यार II
72
सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास । I बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश ।।
73
मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल I अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल II
74
राहत जिसे मिला नहीं ,ये वंचित से लोग । I छप्पन इंची खा गया ,छप्पन-छप्पन भोग ।।
75
मन के भीतर मच गया ,सुबह-सुबह कुहराम I तन के खातिर नाम को ,माया मिली न राम ।।
76
एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर I असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर ।।
77
78
हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर I बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर II
79
अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान I मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान II
80
सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन I जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन II
81
मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक I कौन बताए कब हुआ ,असली राजा रंक II
82
सौदागर ये वहम के ,जीना किया हराम I छुरी लेकर घूमते ,बगल रखे हैं राम II
83
उम्मीद लगा बैठते ,गुठली के हों दाम I सीख गए वे बेचना ,बात-बात में राम II
84
आते-जाते रह गए ,हम सब उनके द्वार I जिसका तय था हो गया ,जी भर के उद्धार II
85
मौन रहा करता सदा,साधना सतत लीन. I जाने कहाँ खिसक रही,पैरों तले जमीन।। II
86
रहते हैं सोए सभी,जनमत हरदम लोग I कौन जगाने आ सका,पाँच साल का रोग II
87
दोहा सादा मंच पर ,दंगल हो शालीन I किसकी चेतना बैठती ,सने पांव कालीन II
88
दोहा देखो मंच पर ,दंगल में तब्दील । I कोई भगत भभूत से ,धूमिल है कंदील ।। II
89
धीरे-धीरे ही छूटता,गुरु देव का साथ I कानो अब भी गूंजता,खोलो बेटा हाथ II
90
एक अजूबा है यही ,दूजे का क्या काम I माया जिसको मिल गई,सूझे उसे कब राम II
91
जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज I वैभव सारा रह गया ,पड़ी काल की गाज II
92
मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम I मन थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम II
93
इस जीवन में आपको,मिले खुशी भंडार I पुरखों के तारक बने,प्रेम सजग व्यवहार II
94
कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार I पहचान करे आप की ,मानव पर उपकार II
95
मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश I नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश II
96
उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश I निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती खामोश II
97
जिंदगी कौन तुझसे, मसखरी कर सका I लड के कहाँ उम्र,अपनी बड़ी कर सका II
98
खुद वजूद से भटकते रहता है आदमी I आप-स्वयं से कब, यायावरी कर सका II
99
तिलस्म दिखे हैं होते कई, यहाँ साहेबान I बिगड़े रिश्तो में कौन, जादूगरी कर सका II
100
निपटना तो अभाव से ,आएगा ही कभी I क्या मजाल कोई उड़न- तश्तरी कर सका II
101
एक बार पहना ,इस्त्री किया कोट वो I जस का तस कब दुबारा उसे घड़ी कर सका II
102
जिस अदालत हैं बेजान से हलफनामे वहां I तेरा मुंनशिफ तुझे कितना बरी कर सका II
103
खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन। I हर करतूत मियाद पर,पाती सजा यकीन ।। II
104
जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार। I बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार।। II
105
आतंक तहों झांकिए,बाबा छाप त्रिशूल। I भगवा-खाकी आड़ ले,सुविधा में मशगूल।। II
106
एक अधम से काम ने,औरो की ली जान। I कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान।। II
107
108
मन आपा मत खोइये,स्तिथि चाहे विपरीत I राम-रसायन घोल के , सुनो प्रेम संगीत II
109
110
गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार I कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार II
111
प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन I मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन II
112
बाढ़ यहां देखो ज़रा,कितने साधन हीन I पानी पानी ढूढते,नीचे पैर जमीन II
113
मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम I सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम II
114
मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग I जलते जलते बच गया ,आहत अमन सुहाग II
115
विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम I प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम -- II
116
एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार I बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार II
117
वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर I भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर II
118
लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ I पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ II
119
आज पलट कर आ गया ,मौसम वो नमकीनI तेरे पन से तू मिटा ,बदला वहम- यकीन II
120
लक्ष्य निशाने साधिए ,शीतल वचन समीर I हिंदी का होगा भला ,बदलेगी तस्वीर II
121
सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर I तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर II
122
आशा का दीपक जला,तम में हुआ अधीर I शांत रहो उजला दिखे,हिंदी की तस्वीर II
123
हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन । I मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।। II
124
पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार I कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार II
125
जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास I फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस II
126
मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल I कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल II
127
बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल I साफ सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल II
128
कर ले कुछ तो नेकियाँ ,कहीं कुए में डाल । शायद दुर्दिन में यही , तेरा रखे खयाल ।।
129
दोहे का सरताज तू ,अहं जरा सँभाल । डंका जिस पर पीटता,मरा हुआ वो खाल ।।
130
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम । इस माया संसार का,किसके पास लगाम ।।
131
रहते हाँ सोए सभी,जनमत हरदम लोग । कौन मिटाने आ सका, पाँच साल का रोग ।।
132
नींद भरी थी आँख में,खुला रहा लंगोट । कोई तपसी दे गया ,जी भर पीछे चोट ।।
133
फूटे करम बिहार के,आग लगी कंदील । किसको सूझे देखना ,पैरों कांटे कील ।।
134
थूक-थूक के चाटना, आज यही है रीत । सत्ता-कुर्सी चाह की ,घुटन भरी है प्रीत ।।
135
अपने मकसद पास वो,बाकी दुनिया फेल । रखता जला मशालची ,खून पसीना तेल ।।
136
जिसको चाहत से चुना,देकर भारी वोट । उस जनता की खैरियत,पूछे कभी न चोट ।।
137
ले चुनाव-रथ घूमते ,देने को सौगात । निकले कैसे बाढ़ में ,थमने दो बरसात ।।
138
आप लगा के बैठते ,अति नीरस अनुमान । फिर से लंका जीत ले ,थका हुआ हनुमान ।।
139
खिसक गई है आज क्यों,पैरों तले जमीन । कल जो तू सरताज था,खारिज आज यकीन ।।
140
जिस पर तुझे गुमान था,है बीमार हकीम । जड़ी बूटियाँ या दवा ,समझे कौन सलीम ।।
141
भूली बिसरी याद कुछ,कोई छेड़ प्रसंग । भटका लोक जहान से,माया-मदिरा संग ।।
142
इत्र-फरोश बने सभी , आदम बदबूदार । नेताओ के रूप में ,निभा रहे किरदार ।।
143
मेरे भीतर मर गया ,पढा-लिखा इंसान । उस दिन से नेता सभी ,बाँट रहे हैं ज्ञान ।।
144
सहमा सोया आदमी,बहुत सहा अपमान । लेकिन फिर भी कह रहा,भारत यही महान ।।
145
पास कभी तो था नहीं,कौड़ी और छिदाम । आज उसी की कोठियां,भरे-भरे गोदाम ।।
146
ऐनक टूटा आँख का,कब सुन पाया कान । तेरा बन्दर बाप जी ,है चतुर बदजुबान ।।
147
सुलगाते ही सोचते ,धूप- अगर-लोभान । मंदिर बज ले घण्टियाँ ,मस्जिद होय अजान ।।
148
बाग़ हरे अब हों भले ,मन मुरझाया फूल । वादा टहनी टूटती ,काँटों सहित बबूल ।।
149
सब का मालिक एक है,क्या गुजरात बिहार । चारो-खाने चित हुई ,जनता की सरकार ।।
150
पास अभी अनमोल ये,जनता का उपकार । देख समझ के बोलिये ,नाविक-खेवनहार ।।
151
वे कहते कुछ दिन सही,सह गुजरात गुजार । अभी-अभी तो लौट हम,देखे रंग हजार ।।
152
मन में अदभुत शांति का ,आवे कभी विचार दौरा कर गुजरात का ,विधायक ले उधार ।।
153
संकट, विपदा,त्रासदी ,सबका एक निदान । भक्तो भगवा ओढ़ के ,खूब लगाओ ध्यान ।।
154
जनता बहती धार में ,बिखरा टूट जहाज । जो कल उनके आम थे ,आज वही है ख़ास ।।
155
किसकी है सरकार जी , कौन लूटता देश । कल की आहत द्रोपदी ,बाँध चुकी है केश ।।
156
बंधन समझ न राखिया ,बहन रही जो भेज । विश्वास अडिग आपसी ,उत्तम दान-दहेज ।।
157
छाँव पलक मैं पालती,रखती तुझे सहेज । भाई निर्मल नेह को, धूप न लगती तेज ।।
158
भाई तेरा प्यार ही,जीवन भर उपहार । आओ चल कर ढूढ ले ,गुमा हुआ संस्कार ।।
159
दुनिया कल भी गोल थी ,दुनिया अबभीगोल। दीमक बन के खा गई ,दीमागी भूगोल ।।
160
लेकर मन पछता रहा ,यौवन में सन्यास । महुआ खिला पड़ौस में,मादक हुआ पलाश ।।
161
दूजे की ले ढपलियां,आप सुनाएँ राग । संयम के दामन लगे ,दुविधाओं के दाग ।।
162
ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह । संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह ।।
163
देख बिहार यही लगे ,अदभुत है कानून । काशी मथुरा घूम के ,घूम देहरादून ।।
164
कौन बना राजा उधर ,कौन यहां पे रंक । किस माथे टीका लगा,किसको लगा कलंक ।।
165
टाँग आपसी खींचना, बन पंचायत खाप । फिर मेढक को तौलने ,क्यों आये हो आप ।।
166
कुछ खाने के दांत हैं ,दिखलाने के और । रहने दो हर बात को ,निजी आपसी तौर ।।
167
कैसे मूक बधिर रहे ,बैठे थे खामोश । सत्तर बीते साल तब ,आया हमको होश ।।
168
कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम । जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम ।।
169
जाने क्यों तब भी कहे ,दिल्ली है अति दूर । खोया क्या हमने यहाँ ,पाया सब भरपूर ।।
170
राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द । अपनी दूकान खोल के,कर दे सबकी बन्द ।।
171
लोभी- लंपट दुष्ट को ,कलयुग स्वर्णिमकाल। किसकी नीयत कब कहें ,आना है भूचाल ।।
172
धुंआ- धुआ होता रहे ,मन उपजा संदेह । बन मे सूखी लकडियाँ ,घर मे सुलगे देह ।।
173
ताने से तन ढांक ले ,बाने से मन भूत । मौन जुलाहा कह गया ,ले धागा औ सूत ।।
174
पीढी को जो तार दे ,अकेला हो सपूत । साई कभी करो जतन ,दे दो राख भभूत ।।
175
यश -अपयश सब साथ है ,भले-बुरे के संग । लकड़ी मे जस घुन लगे ,लोहे मे तस जंग ।।
176
राम -रहीम दुआर मे ,कौन गरीब -अमीर । तू भी बन के देख ले ,पंडित ,पीर फकीर ।।
177
जिसके भीतर 'मै' घुसा ,उतरे तो वह खाल । नफरत के इस कुम्भ मे ,खोज प्रेम लेवाल ।।
178
ले हाथो मे उस्तरा ,बजा गया वो गाल । मेरे माथे जड गया ,मुझसे जुडा सवाल ।।
179
उपर वाला देख रहा,छप्पर है किस हाल । मत माथा अब पीट तू,कर मत तनिक मलाल ।।
180
तन से क्या ताना बुने ,मन बाना विश्वास । एक जुलाहा है चकित ,देखे सूत-कपास ।।
181
आखिर मे बन वो गया ,आडे प्यार रकीब । जिसको हम समझा किये ,मन के बहुत करीब ।।
182
यही अक्ल की खामियां ,बचपन मानो भूल । मन भौरा मंडरा रहा ,तुझे समझ के फूल ।।
183
बिन तुझसे मिल भेंट के ,हलक न उतरे कौर । मन भी कुछ बौरा गया ,देख आम मे बौर ।।
184
नेता झाड़ें दुलत्तियाँ , समझे हो उपकार । किस मिटटी के हो बने ,माधो मेरे यार ।।
185
शीत सुबह के कोहरे ,सिहरन का आघात । छोटे-छोटे दिन हुए ,बड़ी-बड़ी सी रात ।।
186
नेता आकर जीम लो,कंबल वाली घूस । अगहन के दिन आलसी ,कंपकपाती पूस ।।
187
बातो की बस छूरियां,संकट रहता राम । महाकाय सी छवि बनी,दिखता कहीं न काम ।।
188
मैं भी सम्मुख क्यों रखूं ,निर्मोही के गाल । डर से कोई छुप गया ,लेकर हाथ गुलाल ।।
189
एक निशानी प्यार की ,रखो जरा सम्हाल । कब-कब,किस-किस नाम से,होता रहे बवाल ।।
190
चल विकास की बात कर, तुझको रोके कौन । नहीं खोलते मुँह कभी ,रहते हरदम मौन ।।
191
तेरे पीछे घूम कर ,हुआ समय बर्बाद । नाहक रोना-पीटना,नासमझी फरियाद ।।
192
कांटा ही उपजे वहां ,बोया जहाँ बबूल । संयम की हर धारणा ,हो जाती निर्मूल ।।
193
माथे किसने लिख दिया ,स्याही अमिट कलंक । राजा कभी न बन सका ,मन से रहता रंक ।।
194
मजहब का परचम दिखा , खून लगा ये दाग । तुम मशाल क्या ढूढते ,लगी हुई जब आग ।।
195
दुनिया समझती है नहीं,नहीं समझते आप । मुझे अगर है जानना ,कद को मेरे नाप ।।
196
संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान । शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान ।।
197
सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा मांगते भूल । शंका उनको खा रही ,याद जिसे है मूल ।।
198
करवा चौथ चाँद को,छलनी ओट निहार । साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार ।।
199
भूख गरीबी झेलती . जनता है बेहाल । अपना सिक्का ढालने,बिठा रही टकसाल ।।
200
उपलब्धी के नाम जब ,हो जाए अभिमान । दूर इलाके जा कहीं,चिंतन तम्बू तान ।।
201
खाते छप्पन भोग थे,अब खाने मुहताज । ताजमहल की अप्सरा,दफन हुई मुमताज ।।
202
खाने को मुहताज थे,अब है छप्पन भोग । नये-नये इस दौर के,कैसे- कैसे लोग ।।
203
इतने सीधे लोग भी ,बनते हैं लाचार । कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार ।।
204
दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात । लक्षण जवानी के नहीं ,सठियाने की बात ।।
205
सरहद रखवाली लगे ,अपने वीर जवान । उनके हक में त्याग दें ,खर्चीले अरमान ।।
206
जाने कैसे लोग ये ,होते रहे शिकार । बौने से कद में दिखा ,प्रभु जैसा अवतार ।।
207
सन्नाटे की गूंज है ,केवल हो अहसास । बैठ लुटा के आसरा, जीवन के अवकाश ।।
208
मिला किसे है आजतक,सच्चा प्यार समूल । अब अतीत क्या खोदना ,दब जाने दो भूल ।।
209
मन के भीतर मच गया ,सुबह -सुबह कुहराम । तन के खातिर नाम पर ,माया मिली न राम ।।
210
एक अजूबा आज भी ,दिखता है सब ओर । असफलता में नाचता ,झूम झूम के मोर ।।
211
व्यभिचारी मारो वहीँ,अवगुण रहे न शेष । जिस दिन से बन्दी हुआ,साधू लिपटा भेष ।।
212
इस धरती पर ज्ञात है,अवगुण रहे न शेष । आखिर में बन्दी हुआ ,साधू लिपटा भेष ।।
213
अत्याचारी ज्ञात हो ,अवगुण रहे न शेष । पत्थर दिल पिघले कभी ,कर लेना संवाद ।।
214
बन्द नहीं होता कहीं ,साँसों का अनुवाद । जर्जर कितने हो गए ,मजबूतीे आधार ।।
215
216
सदा लक्ष्य पर छोड़िये ,निज भाषा का तीर । तब जाकर बदले कहीं,हिंदी की तस्वीर ।।
217
पुरखो की आशीष में,सुख के खुलते द्वार । कल तर्पण याचक अभी ,डाल सही संस्कार ।।
218
अवसर तुमको है मिला ,पितर करो सम्मान । दुविधाओं के द्वंद से ,निकलो भी यजमान ।।
219
जिनकी संगति में पले , वैतरणी के पास । फुर्सत का तर्पण मिले, यही अधूरी आस ।।
220
मेरे अपने तोड़ते ,मेरे बने उसूल । कहीं तकाजे उम्र के ,कुछ नादानी भूल ।।
221
बच्चा तडफा भूख से,मातायें बेहाल । साफ सियासत की नहीं,घटिया होवे चाल ।।
222
जिसे चला तू काटने ,वे तेरे ही लोग । करा इलाज हकीम से,बरसो का ये रोग ।।
223
प्रतिपल मेरे नाम का ,जपता माला कौन । मार-काट हिंसा सदा ,वो ही रहता मौन ।।
224
मकसद कब पूरा हुआ ,रहे अधूरे काम । सुख की मिलती छाँव तो,लेता मन विश्राम ।।
225
कारावास मिला उसे,कर देगा उद्धार । जली-कटी सी रोटियां,होगी फाइव-स्टार ।।
226
फिरे कैदियों दिन यहां,गया रामअवतार । बाहर करना रह गया ,भीतर का उपचार ।।
227
मन आपा मत खोइये ,स्तिथि चाहे विपरीत । राम-रसायन घोल के ,जी भर करना प्रीत ।।
228
जन-सेवा की बात पर,बना बैठा सरताज । वैभव सारा रह गया ,गिरी काल की गाज ।।
229
एक अधम से काम ने,औरो की ली जान । कानून-नियम नीच का,रखना कठिन विधान ।।
230
सुलग रही है बस्तियां,शहर मचा कुहराम । छूरी वाले हाथ हैं ,बगल दबे हैं राम ।।
231
नुकसान-नफा देख मत,बाबाओं के संग । ज्ञान गया है भाड़ में,नोट कमाय दबंग ।।
232
मेरा बस चलता नहीं,इनकम करता खोज । दावत इनको दें तभी ,जब हो मृत्यु भोज ।।
233
234
सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन । जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन ।।
235
अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील । व्याकुल वही निकालने ,बैठ गया सुशील ।।
236
मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक । राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक ।।
237
कौन किया है बोल ना,पानी तेरा खून. । लुटा-लुटा जज्बात है ,मिटा-मिटा जूनून ।।
238
फुरसत में बुनता रहा ,एक जुलाहा ख़्वाब । लिख-लिख के पाता गया,ढेरों ढेर खिताब ।।
239
240
जनमानस की मैं कहूँ ,कोई कहे न और । मुझको चिता खा रही ,मुंह छिने तू कौर ।।
241
तेरा अडिग सुहाग हो ,अमर रहे बस प्यार । काँटा राह चुभे नहीं,कारज कठिन दुश्वार ।।
242
243
नफरत के माहौल में ,ढूंढो प्रेम सुगंध । अनुरागों से कर सको,जिस कीमत अनुबन्ध ।।
244
मन की बस्ती में लगी ,नफरत की फिर आग । जलते जलते बच गया ,आहत अमन सुहाग ।।
245
246
विधायक जहाँ हो रहे ,सरे आम नीलाम । प्रजातन्त्र की रीढ़ को ,मिले कहाँ आराम -- ।।
247
एक नुमाइश वोट की,जीती बाजी हार । बदला मन में चोट का ,रखना सदा उधार ।।
248
वोट दिखाकर आदमी,हो जाता मशहूर । भरोसा मगर आपसी ,होता चकनाचूर ।।
249
लूटा जैसे गजनवी ,गया खजाना हाथ । पीट-पीट के रह गए ,अपने-अपने माथ ।।
250
किस किस को अब है यहाँ,मुश्किल वाला दौर । कल की बातें और थी ,अब की है कुछ और ।।
251
252
पास हमारे वोट हैं,करते तुम तकरार । मंजिल तक पहुचा गई ,हमको कंडम कार ।।
252
253
रावण करता कल्पना, सोना भरे सुगन्ध । पर कोई सत कर्म सा ,उचित किया न प्रबन्ध ।।
254
254
सीढि स्वर्ग पहुचा सके ,किया रावण विचार । आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार ।।
255
255
मन ने मन से बात की ,खुला रहा इतिहास । कुछ गौरव की बात थी ,दिया किसी ने त्रास ।।
256
257
कौन -कौन आ बैठते,माया रूप जहाज । ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज ।।
257
258
बैठी हूँ मैं छोड़ के,सभी नियम-संकोच । जिस दिन से दरिंदा मुझे ,राहों लिया दबोच ।।
258
259
गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल । जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल ।।
260
260
आओ मिल कर बाँट लें ,वहमों का भूगोल । अगर कसैला स्वाद है ,चीनी ज्यादा घोल ।।
261
261
सदमे में है आदमी ,सहमे-सहमे लोग । कोई भूखा है कहीं ,हाथों छप्पन भोग ।।
262
263
संकट, विपदा,त्रासदी ,सबकी एक ही जात । जब ये आवें साथ में ,जगत हुआ बौरात ।।
263
264
इक रावण को मारकर ,करते हो कुहराम । भीतर फिर से झांक लो ,कितना साबुत राम ।।
264
265
इक रावण बाहर खड़ा ,भीतर बैठा एक । किस किस को तुम मारते ,सह-सह के अतिरेक ।।
265
266
भाई -चारा छीनता,चारे की सब देन । मर्यादा की खींच दी ,जनता ने फिर लेन ।।
267
267
संकट में हो निकटता, दुःख में रखना नेह । ख़ुशी ख़ुशी मैं त्याग दूँ,माटी माफिक देह ।।
268
268
सोने की हो बालियां , चाह न मोती हार । साजन तेरा बाह ही ,जीवन का उपहार ।।
269
270
इस कमरे में बन्द है ,बरसो का इतिहास । आकर तुम भी खोल लो ,मजहब बातें ख़ास ।।
270
271
अंतस डाका डालकर ,चलता दिखा बसंत । यादों के पत्ते झरे ,जिसका आदि न अंत ।।
271
272
कहीं ढपली की गूंज है , कहीं नगाड़ा थाप । फिरतु फगुनाय फिर रहा,कहाँ घूमते आप ।।
273
273
भीतर मन की राख में ,ढूंढ जरा सी आग । सारी दुनिया गा रही ,तू भी गा ले फाग ।।
274
274
अपने बस में अब नहीं ,बस में करना आज । बिखरा है कुनबा सभी ,टूटा हुआ समाज ।।
275
276
नोटबन्दी हुई वजह , हाथ जरा है तंग । वरना हम भी डालते ,अमिट असीमित रंग ।।
276
277
ढपली गूंज कहीं- कहीं, कहीं नगाड़ा थाप । फगुनाय फिरतु फिर रहा ,कहाँ घुमाते आप ।।
277
278
मन की जैसी धारणा ,वैसा रख उत्साह । एक जलन की आग से,घर-घर हुआ तबाह ।।
279
279
बूढ़े बरगद ने पढा ,पोथी- ज्ञान किताब । उल-जलूल तू ने लिखा ,पाता रहा खिताब ।।
280
280
एक उधर संयोग था,एक यहां संयोग । हठधर्मी हथिया लिया ,राजपाठ बिन योग ।।
281
282
दोहे तुम भी सीखना ,नौसिखिये हो यार । हलन्त कामा,भूल की ,करना बाद विचार ।।
282
283
सोया है प्रहरी जहां,दुर्घटनाएं देख । शासक ही बहरा हुआ,बेमतलब उल्लेख ।।
283
284
हाथ बचा के तोड़ ले,देख गुलाबी फूल । कांटो का मौसम कहीं,आज हुआ अनुकूल ।।
285
285
कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग । हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग ।।
286
286
हम विकास क्या देखते ,असफल रहे उपाय । झाँक सके वो आकड़े,पब्लिक दिया बताय ।।
287
288
हमको कौन हिला गया ,चुप बैठे थे मौन । मन बबूल से छिल गया,अर्थहीन सागौन ।।
288
289
गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार । कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार ।।
289
290
गोदान नहीं तो नहीं,वैतरणी हो पार । कुछ पुराण से सीख ले,बहुत हुआ व्यापार ।।
291
291
बाबाओं के फेर में ,अस्मत लुटे बजार । सौदा-सच्चा मत कहो ,घाटे का व्यापार ।।
292
292
बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर । हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत खोर ।।
293
294
हिंसा औ प्रतिशोध का,व्यापक सह व्यापार । जिसके पास लगाम है ,करता अत्याचार ।।
294
295
रहे सलामत देख लो,कुर्सी सहित खिताब । हलके हमको ले रहे,होंगे भारी चीज ।।
295
296
समय आपका मान लें ,सीखें अदब तमीज । हलके हमको ले रहे,होंगे भारी चीज ।।
297
297
नफरत के बारूद का ,बिछा गया है ढेर । सोते से अब जागिये ,होने को है देर ।।
298
298
पाखंडी-पापी चढ़े ,छप्पन- छप्पन भोग । हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग ।।
299
300
मौजूदा माहौल से, नफरत करे सलीम । हम बच्चो को दे रहे ,कैसी ये तालीम ।।
300
301
सौ बार लुटे गजनवी ,उजड़े ना ये गाँव । अंगद के जैसा जमे,उखड़े ना ये पाँव ।।
301
302
किसी ड्राइंग रूम का ,बिगड़े ना कालीन । हममे ये संस्कार हो ,होली हो शालीन ।।
303
303
हर दुविधा के गाल हो, ख़ुशी अबीर प्रतीत । लिखो समय के भाल पर ,फागुन के सुर गीत ।।
304
304
मन थोड़े विश्वास का,अलख जगा गुमनाम । मंदिर द्वारे छोड़ के ,भटक रहा है राम ।।
305
306
पहचान करे आप की ,मानव पर उपकार । कार्ड एक यही नया ,जीवन का आधार ।।
306
307
नाजुक रिश्ता पालता,एक तरफ खामोश । मन चंचल अब यूँ हुआ ,जैसे हो खरगोश ।।
307
308
निर्दय लोगो बीच में ,अब रहती खामोश । उछल कूद करती हुई ,बहना थी खरगोश ।।
309
309
पर ज्ञानी का झुक गया,गर्व भरा अभिमान । रहता रावण सोचता,सीढि स्वर्ग दूँ तान ।।
310
310
ज्ञान अकारथ हो गया, बीस आँखों में उजला । गर्व भरा अभिमान,समय ने करवट बदला ।।
311
311
गठरी ले के गर्व की,नहीं संयम रहता । इसीलिए केवल यही ,इशारों में कहता ।।
312
313
पाखंड-पाप चांटते ,छप्पन- छप्पन भोग । हैरान यही देखकर ,बदल न पाए लोग ।।
313
314
बाहर कहीं बहार है,चार तरफ तितलियाँ । छप्पन-छप्पन भोग,रहे घी में उंगलियां ।।
314
315
खेलो खाओ लूट लो,लोग हैरान नहीं । हांफ रहे क्यों आज भी,देख मैदान वही ।।
316
316
जनता अपने खून में,पाती नहीं उबाल । गिनती की हैं रोटियां,मतलब के रखवाल ।।
317
317
है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे । पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे ।।
318
319
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार । सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार ।।
319
जाते हुए सिखा गए,ये गोरे अंग्रेज।
रखवाली सरहद करो, रख तलवारें तेज ।।
*
हिम्मत कभी न हारिए, साहस भी मत छोड़ ।
एक करोना बात क्या, जग में रोग करोड़ ।।
*
हाथो हजार कर गया,उल्टे सीधे काम ।
मुंह ढाप सोया अभी,दर्शन दुर्लभ राम ।।
*
किसे शिकायत हो भला ,कोई क्यूं नाराज।
माया नगरी खेल में,सब के सर में ताज ।।
*
बारिश की संभावना, बाढ़ नदी संकेत।
तू किसान बैठा यहां,कौन देखता खेत।।
*
दांवपेंच कानून के , फसलों को आघात।
घिसता किसान जूतियां ,पागल के अनुपात ।।
*
हाथ वक्त मारा हुआ ,ये बचा बदनसीब।
वंचित है लाचार है ,गिनती बढ़ा गरीब ।।
*
सुशील यादव
सरसी छंद में परिवर्तित दोहे 2
*
हमको सिखा गए हैं जाते ,ये गोरे अंग्रेज।
खूब करो सरहद रखवाली , रख तलवारें तेज ।।
*
आप कभी हिम्मत ना हारें, साहस ना दें छोड़ ।
बात भला क्या एक करोना , जग में रोग करोड़ ।।
*
कर गया हाथ हजार वाला,उल्टे सीधे काम ।
मुंह ढाप के अब है सोना ,दर्शन दुर्लभ राम ।।
*
यहां भला हो किसे शिकायत ,कोई क्यूं नाराज।
है नगरी सारी माया की। ,सब के सर में ताज ।।
*
संभावना बढ़ती बारिश की, बाढ़ नदी संकेत।
देखूं तुझको किसान बैठा ,कौन देखता खेत।।
*
दांवपेंच सब है कानूनी , फसलों को आघात।
घिसता किसान अपनी जूती ,पागल के अनुपात ।।
*
मारा हुआ वक्त के हाथो ,ये बचा बदनसीब।
है जिंदगी लाचार वंचित ,गिनती बढ़ा गरीब ।।
*
सुशील यादव