Saturday, 24 September 2022

सादगी

26.1.2017देख तुम्हारी सादगी , अपने-अपने दंभ को ,भूल-बिसर के आज शामिल होली में रहो ,जुड़ता दिखे समाज # फागुन-फागुन सा हुआ ,सावन बिछुड़ा मीत छोड़ अधर की बासुरी ,राधा विरहा गीत # कायरता की राह में ,हद से निकले पार माया जननी मोह की,देख यही संसार # पद प्रतिष्ठा वो छोड़ के ,सड़कें नापे रोज कीचड़-कीचड़ में खिले ,पंकज,कमल,सरोज # देख तुम्हारी सादगी , हाथो बचा गुलाल जीवन सारा काट दे ,इतनी सोच मलाल सुशील यादव,दुर्ग 7.3.17 राजनीति के छल-कपट, संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास कल थे वे जो रूबरू ,जन सेवक बन बीच आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच रेखा कभी- कहाँ खिंची,परंपरा के खेल देखो जला मशालची,जितनी-जी भर तेल अवगुन पीछे छोड़ कर ,गुन की करे बखान राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान सुशील यादव मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर चुपड़ी की चाहत अगर , ज्ञान जला तंदूर $ जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण $ तीरथ करके लौट आ,देख ले चार धाम मन भीतर क्या झांकता ,उधर मचा कुहराम $ मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर $ आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर तब -तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर $$

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